य एकोऽवर्णो बहुधा शक्तियोगाद्वर्णाननेकान्निहितार्थो दधाति।
वि चैति चान्ते विश्वमादौ स देवः स नो बुद्ध्या शुभया संयुनक्तु॥
'वह' जो एकमेव अद्वितीय एवं रूप-वर्ण-विहीन है, वह अपने शक्तियोग से अनेक वर्ण, अनेक रूप धारण करने का निश्चय कर लेता है तथा स्वयं में अनेक पदार्थों को धारण कर लेता है, और अन्त में यह विश्व 'उसी' में विलीन हो जाता है, आदिकाल में केवल वही 'देव' विद्यमान था। 'वह' हमें शुभ एवं तेजस्वी बुद्धि से युक्त करे।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
श्वेताश्वतर के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
श्वेताश्वतर के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।