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श्वेताश्वतर • अध्याय 4 • श्लोक 7
समाने वृक्षे पुरुषो निमग्नोऽनीशया शोचति मुह्यमानः। जुष्टं यदा पश्यत्यन्यमीशमस्य महिमानमिति वीतशोकः॥
समान वृक्ष पर एक 'पुरुष' (आस्वाद लेने में) निमग्न है और वह 'अनीश' (स्वयं का ईश नहीं) होने के कारण, मोहवशात् शोक करता है; किन्तु जब वह उस अन्य 'पुरुष' को देखता है तथा उससे सायुज्य स्थापित कर लेता है जो 'ईश' है, एवं वह इस समस्त जगत् में 'उसकी' महिमा को जान जाता है, तब वह शोकरहित हो जाता है।
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