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श्वेताश्वतर • अध्याय 4 • श्लोक 16
घृतात्परं मण्डमिवातिसूक्ष्मं ज्ञात्वा शिवं सर्वभूतेषु गूढम्‌। विश्वस्यैकं परिवेष्टितारं ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः॥
वह 'देव' जो धी के ऊपर आयी मलाई के समान अतिसूक्ष्म है, जो 'शिव' है तथा समस्त चराचर में गुह्यरूप से निहित है, जो 'एक' होते हुए भी समस्त विश्व को परिवेष्टित किये हुए है, उस 'देव' को इस रूप में जानकर मनुष्य समस्त बन्धनों से मुक्त हो जाता है।
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