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श्वेताश्वतर • अध्याय 4 • श्लोक 14
सूक्ष्मातिसूक्ष्मं कलिलस्य मध्ये विश्वस्य स्रष्ठारमनेकरूपम्‌। विश्वस्यैकं परिवेष्टितारं ज्ञात्वा शिवं शान्तिमत्यन्तमेति॥
इस महती अव्यवस्था (कलिल) के बीच जो सूक्ष्मातिसूक्ष्म (सत्य) है, विश्व का जो अनेकरूपधारी स्रष्टा है, तथा जो 'एक' होते हुए भी समस्त विश्व को परिवेष्टित किये हुए है, उसे 'शिव'–मंगलकारी जानकर मनुष्य आत्यन्तिक रूप से शान्ति को प्राप्त करता है।
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