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श्वेताश्वतर • अध्याय 4 • श्लोक 12
यो देवानां प्रभवश्चोद्भवश्च विश्वाधिपो रुद्रो महर्षिः। हिरण्यगर्भं पश्यत जायमानं स नो बुद्ध्या शुभया संयुनक्तु॥
वह जो देवो का प्रभव (जन्म) है तथा उनकी सत्ता का उद्भव है, जो विश्व का अधिपति है, 'रुद्र' है, 'महर्षि' -महान् द्रष्टा है, एवं जिसने जन्म ग्रहण करते हुए 'हिरण्यगर्भ' को देखा था,-वह हमें तेजस्वी तथा शुभ-बुद्धि से संयुक्त करे।
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