अध्याय 10 — दशम अध्याय
शिवभारतम्
23 श्लोक • केवल अनुवाद
कवींद्र बोलें - एक बार भगवान शंकर की पूजा करके पुण्यवान शाहजी राजा सुखशय्या पर सो रहे थे तब जिसके पंचमुख प्रसन्न है, जिसको दस हाथ एवं तीन आंखें हैं, जो गंगाजल से स्निग्धता को प्राप्त हुई जटा के संयोग से मनोहर दिख रहा है, जिसके मस्तक पर अर्धचंद्राकार दिख रहा है, जिसके कपाल को त्रिपुंडू के संयोग से शोभा प्राप्त हुई है, जिसका कंठ मरकतमणि के सामान हरा है, जिसने सांपों के आभूषण पहन रखे हैं, जिसने अनेक प्रकार के शखों को धारण किया हुआ है, जो वरदाता, अभयदाता एवं बलशाली है, जिसने व्याघ्र चर्म को ओढ़ रखा है एवं गज चर्म को पहन रखा है, जो सर्व मुक्ति का आदि कारण है और सभी ऐश्वयों का खजाना है, जिसको इंद्र विष्णु आदि देव नमन करते हैं, योगियों में सर्वश्रेष्ठ योगी है ऐसे त्रिपुरारी शंकर को सभी लोकों के साथ एवं पार्वती के साथ स्वप्न में वर्तमान देखकर वह आश्चर्यचकित हो गया।
श्रुति, स्मृति, पुराणों, भारत, राजनीति, सभी शास्त्र, काव्य, रामायण तथा व्यायाम, वास्तु विद्या, फलित ज्योतिष, अंगों सहित धनुर्वेद, उसी प्रकार सामुद्रिक शाख, अनेक प्रकार की भाषाएं, पद्य, सुभाषित, हाथी घोड़े एवं रथ की सवारी तथा उनके लक्षणों में, चढ़ना, उतरना, दौड़ना एवं छलांग लगाना, तलवार, धनुष, चक्र, भाला, पट्टा एवं शक्तियों, युद्ध, बाहुयुद्ध, किलों को अभेद्य बनाना, दुर्लभ लक्ष्यों पर निशाना लगाना, दुर्गम स्थानों से निकलना, इशारों को समझना, जादूगिरी, विष को उतारना, अनेक प्रकार के रत्नों की परीक्षा, लिपियों का ज्ञान इन सभी शास्त्रों एवं कलाओं में स्वयं निपुण होकर सभी गुरुजनों को बड़ा यश प्रदान किया और उसने ज्ञानपूर्वक उनका बारंबार उपयोग भी किया।