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अध्याय 10 — दशम अध्याय

शिवभारतम्
23 श्लोक • केवल अनुवाद
कवींद्र बोले - जब शिवाजी को बारहवां वर्ष चालू हो गया तब शाहजीराजे ने शंकर की आज्ञा से सूर्य के समान तेजस्वी एवं शुभ लक्षणों से युक्त संभाजी के छोटे भाई को बुलाकर पुणे प्रांत का अधिकार सौंप दिया।
पंडित बोले - भगवान शंकर की आज्ञा से शिवाजी को शहाजी ने पुणे कैसे भेजा? और पिता की आज्ञा से वह शिवाजी पुणे कैसे गया? हे कविश्रेष्ठ! परमानंद हमें बताओ।
कवींद्र बोलें - एक बार भगवान शंकर की पूजा करके पुण्यवान शाहजी राजा सुखशय्या पर सो रहे थे तब जिसके पंचमुख प्रसन्न है, जिसको दस हाथ एवं तीन आंखें हैं, जो गंगाजल से स्निग्धता को प्राप्त हुई जटा के संयोग से मनोहर दिख रहा है, जिसके मस्तक पर अर्धचंद्राकार दिख रहा है, जिसके कपाल को त्रिपुंडू के संयोग से शोभा प्राप्त हुई है, जिसका कंठ मरकतमणि के सामान हरा है, जिसने सांपों के आभूषण पहन रखे हैं, जिसने अनेक प्रकार के शखों को धारण किया हुआ है, जो वरदाता, अभयदाता एवं बलशाली है, जिसने व्याघ्र चर्म को ओढ़ रखा है एवं गज चर्म को पहन रखा है, जो सर्व मुक्ति का आदि कारण है और सभी ऐश्वयों का खजाना है, जिसको इंद्र विष्णु आदि देव नमन करते हैं, योगियों में सर्वश्रेष्ठ योगी है ऐसे त्रिपुरारी शंकर को सभी लोकों के साथ एवं पार्वती के साथ स्वप्न में वर्तमान देखकर वह आश्चर्यचकित हो गया।
उस शंकर को प्रत्यक्ष देखकर स्वयं ने उसका वंदन किया और अतिशय आनंद को प्राप्त होता हुआ वह हाथ जोड़कर उसके सामने खड़ा हो गया।
तत्पश्चात अप्रतिष्ठित शक्ति वाले शंकर अपने भक्त शाहजीराजे पर अनुग्रह करके बोलें।
हे सूर्यवंशी महाबाहु, बुद्धिमान शाहजीराजा! मेरे इन वचनों को ध्यान से सुनो इसमें ही तुम्हारा कल्याण हैं। यह जो तेरा छोटा बेटा तेरे समीप सुशोभित हो रहा है उसको शुभ लक्षणों से युक्त भगवान विष्णु है ऐसा जानो। यह तेरा पुत्र विष्णु धीरे-धीर वृद्धि को प्राप्त होता हुआ संपूर्ण पृथ्वी पर आक्रमण करके यवनों का संहार करेगा और यह भक्तवत्सला पार्वती देवी समय-समय पर समीप आकर उसकी रक्षा करेगी। पृथ्वी के भार का हरण करने वाला एवं शत्रु पक्ष के राजाओं का संहार करने वाला यह मेरा भक्त सभी के लिए अजेय होगा इसलिए हे महाशय! इस शिवाजी नाम के महाबहु को पुणे प्रांत की बड़ी जिम्मेदारी सौंप दो।
उसको इस प्रकार बोलकर, शंकर ने मोतियों की माला को स्वयं उस राजकुमार के गले में डाल दिया।
इस प्रकार शंकर के अंतःकरण में प्रेम के आविर्भूत होने से वह राजा ब्रह्म मुहूर्त में ही जागृत हो गया।
स्वयं की तपस्या से विशिष्ट ऐसा वह विस्मय युक्त राजा शंकर की मूर्ति का बारंबार ध्यान करते हुए सुबह सूर्य के समान तेजस्वी प्रभाकर नाम के पुरोहित को बुलाकर अपने सपने में घटित घटना को बताया।
तब आनंदित होकर उस पुरोहित के अनुमोदन करने पर शहाजी ने शिवाजी को पुणे प्रांत का अधिपति नियुक्त किया।
प्रतापी पिता के द्वारा उसको आधिपत्य देने पर, स्वदेश जाने की इच्छा वाला वह शिवाजी विशेष सुशोभित हो रहा था।
तत्पश्चात कुछ हाथी, घोड़े एवं पैदल सेना, पीढ़ी प्राप्त विश्वासपात्र अमात्य, विख्यात अध्यापक, उच्च ध्वज, विपुल कोष तथा अद्वितीय कर्मों को करने वाले अन्य परिजन इन सबके साथ उस पुण्यशील बेटे को शाहजी राजे ने शुभ दिन पर पुणे भेज दिया।
फिर कुछ दिनों बाद वह सूर्यवंशी शिवाजी राजा कर्नाटक प्रांत से महाराष्ट्र के लिए चल दिया।
प्रभाव, उत्साह एवं मंत्र इन तीन शक्तियों से युक्त तथा सेना समूह एवं स्वयं की राजलक्ष्मी से युक्त वह शिवाजी राजा पुणे शहर पहुंच गया।
राष्ट्र का हित करने वाले एवं राष्ट्र को प्रकाशित करने वाले उस लोक मित्र को लोगों ने देखा किंतु पहचान नहीं पाए।
तत्पश्चात अनुकूल मंत्रियों के सहायता से प्रजाओं को आनंद देता हुआ वह शिवाजी अपने यश के साथ क्रमशः वृद्धि को प्राप्त होने लगा।
तब उसके साम्राज्य में महाराष्ट्र राज्य की प्रजा समृद्ध हुई और महाराष्ट्र यह नाम सार्थक सिद्ध हुआ।
उस विनयशील एवं गुणवान शिवाजी के अधीनस्थ गुरुजन कृतार्थ हो गए क्योंकि उनके द्वारा सिखाई हुई, सर्व विद्याओं एवं कलाओं में वह शिवाजी निपुण हो गया।
श्रुति, स्मृति, पुराणों, भारत, राजनीति, सभी शास्त्र, काव्य, रामायण तथा व्यायाम, वास्तु विद्या, फलित ज्योतिष, अंगों सहित धनुर्वेद, उसी प्रकार सामुद्रिक शाख, अनेक प्रकार की भाषाएं, पद्य, सुभाषित, हाथी घोड़े एवं रथ की सवारी तथा उनके लक्षणों में, चढ़ना, उतरना, दौड़ना एवं छलांग लगाना, तलवार, धनुष, चक्र, भाला, पट्टा एवं शक्तियों, युद्ध, बाहुयुद्ध, किलों को अभेद्य बनाना, दुर्लभ लक्ष्यों पर निशाना लगाना, दुर्गम स्थानों से निकलना, इशारों को समझना, जादूगिरी, विष को उतारना, अनेक प्रकार के रत्नों की परीक्षा, लिपियों का ज्ञान इन सभी शास्त्रों एवं कलाओं में स्वयं निपुण होकर सभी गुरुजनों को बड़ा यश प्रदान किया और उसने ज्ञानपूर्वक उनका बारंबार उपयोग भी किया।
वसंत ऋतु के वैभव से देवतरू जैसे सुशोभित होता है वैसे ही यह शिवाजी नव यौवन के आरंभ में अभिनव शोभा से सुशोभित होने लगा।
कौमार अवस्था की समाप्ति पर जिसमें नवयौवन प्रस्फुटित हो रहा है और जिसके अंग कामदेव जैसे लावण्य विलसित होकर मनोहर है ऐसे उस शिवाजी राजा को सती, शीलवती, रमणीय रूपवती एवं अत्यंत गुण शालिनी पवार कुल में उत्पन्न पत्नी प्राप्त हुई।
रुक्मणी की प्राप्ति से श्रीकृष्ण जैसे आनंदित हुए, वैसे ही पूर्वजन्म की इस सुंदर पत्नी को प्राप्त करके शिवाजी आनंदित हुए।
पूर्व जन्म से ही परिचित होने से एवं पुनः इस युगल के एकत्र आ जाने से उन दोनों में परस्पर प्रेम उत्पन्न हो गया और फिर धर्म अर्थ एवं काम इन तीन पुरुषार्थों के भी इस युगल में एकत्र आ जाने से वे अत्यधिक सुशोभित होने लगे।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
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