श्रुतिस्मृतिपुराणेषु भारते दण्डनीतिषु। समस्तेष्वपि शास्त्रेषु काव्ये रामायणे तथा। व्यायामे वास्तुविद्यायां होरासु गणितेष्वपि । धनुर्वेदचिकित्सायां मते सामुद्रिके पुनः ।। तासु तासु च भाषासु छन्दस्सु च सुभाषिते। चर्यास्विभरथाश्चानां तथा तल्लक्षणेष्वपि ।। आरोहणे प्रतरणे चंक्रमे च विघंलने। कृपाणचापचकेषु प्रासपट्टिशशक्तिषु ।। युद्धे नियुद्धे दुर्गाणां दुर्गमीकरणेषु च। दुर्लक्ष्यलक्ष्यवेधेषु दुर्गमाभिगमेष्वपि।। इङ्गितेषु च मायासु विषनिर्हरणादिषु। तत्तद्रत्नपरीक्षायामवधाने लिपिष्वपि।। प्रवीणः स स्वयं तांस्तान् गूरुन् गुरुयशोभरैः। अयोजयत् भृशं तत्तत् प्रत्यभिज्ञानवान् विभुः ।।
श्रुति, स्मृति, पुराणों, भारत, राजनीति, सभी शास्त्र, काव्य, रामायण तथा व्यायाम, वास्तु विद्या, फलित ज्योतिष, अंगों सहित धनुर्वेद, उसी प्रकार सामुद्रिक शाख, अनेक प्रकार की भाषाएं, पद्य, सुभाषित, हाथी घोड़े एवं रथ की सवारी तथा उनके लक्षणों में, चढ़ना, उतरना, दौड़ना एवं छलांग लगाना, तलवार, धनुष, चक्र, भाला, पट्टा एवं शक्तियों, युद्ध, बाहुयुद्ध, किलों को अभेद्य बनाना, दुर्लभ लक्ष्यों पर निशाना लगाना, दुर्गम स्थानों से निकलना, इशारों को समझना, जादूगिरी, विष को उतारना, अनेक प्रकार के रत्नों की परीक्षा, लिपियों का ज्ञान इन सभी शास्त्रों एवं कलाओं में स्वयं निपुण होकर सभी गुरुजनों को बड़ा यश प्रदान किया और उसने ज्ञानपूर्वक उनका बारंबार उपयोग भी किया।
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