ततः कतिपयैरेव गजवाजिपदातिभिः । मौलैराप्तिरमात्यैश्च ख्यातैरध्यापकैरपि ।।
विरुदैव ध्वजैरुच्चैः कोषेणापि च भूयसा। तथा परिजनैरन्यैरनन्यसमकर्मभिः ।।
समवेतममुं शाहभूपतिश्शोभने दिने। प्राहिणोत्पुण्यदेशाय पुण्यकारिणमात्मजम्।।
तत्पश्चात कुछ हाथी, घोड़े एवं पैदल सेना, पीढ़ी प्राप्त विश्वासपात्र अमात्य, विख्यात अध्यापक, उच्च ध्वज, विपुल कोष तथा अद्वितीय कर्मों को करने वाले अन्य परिजन इन सबके साथ उस पुण्यशील बेटे को शाहजी राजे ने शुभ दिन पर पुणे भेज दिया।
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