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शिवभारतम् • अध्याय 10 • श्लोक 9
विशिष्टः स्वेन तपसा विस्मयाविष्टमानसः । तामेव मूर्तिमीशस्य ध्यायन्नेष मुहुर्मुहुः ।। प्रातः प्रभाकरन्नाम प्रभाकरसमप्रभम्। पुरोहितं समानाय्य शशंस स्वप्नमात्मनः ।।
स्वयं की तपस्या से विशिष्ट ऐसा वह विस्मय युक्त राजा शंकर की मूर्ति का बारंबार ध्यान करते हुए सुबह सूर्य के समान तेजस्वी प्रभाकर नाम के पुरोहित को बुलाकर अपने सपने में घटित घटना को बताया।
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