अथ तस्मिन्नाधिपत्ये पित्रादत्ते प्रतापिना।
प्रयातुकामः स्वं राष्ट्र शिवराजो व्यराजत ।।
प्रतापी पिता के द्वारा उसको आधिपत्य देने पर, स्वदेश जाने की इच्छा वाला वह शिवाजी विशेष सुशोभित हो रहा था।
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