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शिवभारतम् • अध्याय 10 • श्लोक 3
कवीन्द्र उवाच - एकदाभ्यर्च्य भवने भगवन्तं वृषध्वजम्। शयानस्सुखशव्यायां सुकृती शाहभूपतिः ।। प्रसन्नपञ्चवदने दशहस्तं त्रिलोचनम्। मन्दाकिनीजलस्निग्ध जटाजूटमनोहरम् ।। शीतांशुशकलोत्तंसं त्रिपुण्ड्रललितद्युतिम्। हरिन्मणिनिभग्रीवं सरीसृपविभूषणम्।। वराभयप्रदं वीरं विविधायुधधारिणम्। द्वीपिचर्मोत्तरासङ्ग द्विपचर्माधराम्बरम्।। निदानं सर्वमुक्तीनां निधानं सकलश्रियाम्। योगिनं योगिनामिद्रमिन्द्रोपेन्द्रादिवन्दितम्।। समस्तलोकसहितं सहितं गिरिकन्यया। अपश्यद्विस्मितः स्वप्ने पुरस्तात्रिपुरद्विषम् ।।
कवींद्र बोलें - एक बार भगवान शंकर की पूजा करके पुण्यवान शाहजी राजा सुखशय्या पर सो रहे थे तब जिसके पंचमुख प्रसन्न है, जिसको दस हाथ एवं तीन आंखें हैं, जो गंगाजल से स्निग्धता को प्राप्त हुई जटा के संयोग से मनोहर दिख रहा है, जिसके मस्तक पर अर्धचंद्राकार दिख रहा है, जिसके कपाल को त्रिपुंडू के संयोग से शोभा प्राप्त हुई है, जिसका कंठ मरकतमणि के सामान हरा है, जिसने सांपों के आभूषण पहन रखे हैं, जिसने अनेक प्रकार के शखों को धारण किया हुआ है, जो वरदाता, अभयदाता एवं बलशाली है, जिसने व्याघ्र चर्म को ओढ़ रखा है एवं गज चर्म को पहन रखा है, जो सर्व मुक्ति का आदि कारण है और सभी ऐश्वयों का खजाना है, जिसको इंद्र विष्णु आदि देव नमन करते हैं, योगियों में सर्वश्रेष्ठ योगी है ऐसे त्रिपुरारी शंकर को सभी लोकों के साथ एवं पार्वती के साथ स्वप्न में वर्तमान देखकर वह आश्चर्यचकित हो गया।
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