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शिवभारतम् • अध्याय 10 • श्लोक 15
चक्रप्रियकरः सद्यः समुल्लासितमण्डलम्। नावेदयदमुं लोकबन्धुं लोको व्यलोकत ।।
राष्ट्र का हित करने वाले एवं राष्ट्र को प्रकाशित करने वाले उस लोक मित्र को लोगों ने देखा किंतु पहचान नहीं पाए।
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