स एष यौवनारम्भे दधानोऽभिनवां श्रियम्।
व्यभाद्यथा वासन्तविभवे सुरुभूरुहः ।।
वसंत ऋतु के वैभव से देवतरू जैसे सुशोभित होता है वैसे ही यह शिवाजी नव यौवन के आरंभ में अभिनव शोभा से सुशोभित होने लगा।
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