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अध्याय 16 — द्विधाभक्ति

प्रबोधसुधाकर
18 श्लोक • केवल अनुवाद
चित्त में सत्त्वगुण उत्पन्न होने पर ज्ञान का बिजली के समान उदय तो हो जाता है, परन्तु वह स्थिर तभी रहता है जब चित्त शुद्ध हो जाता है।
किन्तु अन्तःकरण भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र के चरणकमलों की भक्ति के बिना कभी शुद्ध नहीं हो सकता। जैसे वस्त्र को खारयुक्त जल से शुद्ध किया जाता है, उसी प्रकार चित्त को भक्ति से निर्मल किया जा सकता है।
जिस प्रकार राख आदि से चिरकाल तक मार्जन करने से मलिन दर्पण के स्वच्छ हो जाने पर उसमें मुख का प्रतिबिम्ब स्पष्ट पड़ने लगता है उसी प्रकार शुद्ध चित्त में ज्ञान का आविर्भाव हो जाता है।
जो लोग हरि-भक्ति से ज्ञानी हुए हैं, वे अपने ज्ञान का बीज (कारण) समझ लें। 'मूर्त्त (साकार) और अमूर्त (निराकार) दोनों ही ब्रह्म के रूप हैं' - ऐसा उपनिषद् कहते हैं।
और भगवान्ने भी उन दोनों रूपों के (व्यक्तोपासक तथा अव्यक्तोपासक - भेद से) दो प्रकार के भक्त बताये हैं। इनमें से एक (अव्यक्तोपासक) को क्लेश से और दूसरे (व्यक्तोपासक) को सुगमता से मुक्ति मिलती है।
भगवान्की भक्ति स्थूल और सूक्ष्म दो प्रकार की कही गयी है; उनमें पहले स्थूल-भक्ति होती है और फिर उसी में से सूक्ष्म भक्ति का उदय होता है।
अपने वर्णाश्रम-धर्मो का आचरण करना, नित्य भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र की प्रतिमा का उत्साहपूर्वक विविध सामग्रियों से पूजनोत्सव करना, निरन्तर हरि-भक्तों का संग करना,
भगवत्कथाओं के सुनने में अत्यन्त उत्साह रखना, सत्य भाषण करना तथा परखी, परधन और परनिन्दा से दूर रहना,
अश्लील बातों से घृणा करना, पुण्य-तीर्थ-स्थानों में जाने के लिये तत्पर रहना तथा 'भगवत्कथा- श्रवणादि के बिना यह आयु व्यर्थ ही बीत गई' ऐसी चिन्ता करना - ये सब स्थूल-भक्ति के लक्षण हैं।
इस प्रकार स्थूल-भक्ति का अभ्यास करते-करते भगवत्कथा के अनुग्रह से सूक्ष्म-भक्ति का उदय होता है, जिसके भीतर भगवान्‌ की उपलब्धि होती है।
उस सूक्ष्म-भक्ति के लक्षण ये हैं - स्मृति और पुराणों के सद्वाक्यों से सुनी हुई भगवान्‌ की मूर्ति के मानस-पूजन का अभ्यास, एकान्त-सेवन में तत्पर रहना,
सत्य, समस्त प्राणियों में श्रीकृष्णचन्द्र को वर्तमान जानना और सम्पूर्ण प्राणियों से अद्रोह। इन साधनों से समस्त प्राणियों पर दया उत्पन्न हो जाती है।
इनके सिवा प्रारब्धानुकूल खल्प लाभ में सन्तोष रखना, स्त्री और पुत्र आदि में ममताशून्य होना, अहङ्कार और क्रोध से रहित होना,
मृदु भाषण करना, प्रसन्न-चित्त रहना, अपनी निन्दा और स्तुति में समान रहना, सुख-दुःख और शीतोष्णादि द्वन्द्वों को सहन करना, आपत्ति से भय न करना,
निद्रा, आहार और विहारादि में अनादर, अनासक्त रहना, व्यर्थ वार्तालाप के लिये अवकाश न देना, श्रीकृष्ण-स्मरण से निरन्तर शान्त-चित्त रहना तथा
कोई भगवत्सम्बन्धी गीत का गान करे अथवा बाँसुरी बजावे तो एक ही समय आनन्द का आविर्भाव और सात्त्विक भावों का प्रौढ़ उद्रेक हो जाना।
उस सत्वोद्रेक में रोककर रखा हुआ मन परमात्मसुख का अनुभव करता है। फिर उस (परमात्मसुख) के स्थिर हो जाने पर चित्त की अवस्था मतवाले हाथी के समान हो जाती है।
और वह क्रमशः समस्त प्राणियों में भगवान्‌ को और भगवान्में समस्त प्राणियों को देखने लगता है, यदि ऐसी अवस्था हो जाय तो वह तत्काल भगवद्भक्तों में श्रेष्ठ हो जाता है।
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