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प्रबोधसुधाकर • अध्याय 16 • श्लोक 2
शुद्ध्यति हि नान्तरात्मा कृष्णपदाम्भोजभक्तिमृते । वसनमिव क्षारोदैर्भक्त्या प्रक्षाल्यते चेतः ॥
किन्तु अन्तःकरण भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र के चरणकमलों की भक्ति के बिना कभी शुद्ध नहीं हो सकता। जैसे वस्त्र को खारयुक्त जल से शुद्ध किया जाता है, उसी प्रकार चित्त को भक्ति से निर्मल किया जा सकता है।
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