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प्रबोधसुधाकर • अध्याय 16 • श्लोक 4
जानन्तु तत्र बीजं हरिभक्त्या ज्ञानिनो ये स्युः । मूर्तं चैवामूर्तं द्वे एव ब्रह्मणो रूपे ॥
जो लोग हरि-भक्ति से ज्ञानी हुए हैं, वे अपने ज्ञान का बीज (कारण) समझ लें। 'मूर्त्त (साकार) और अमूर्त (निराकार) दोनों ही ब्रह्म के रूप हैं' - ऐसा उपनिषद् कहते हैं।
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