जिस प्रकार राख आदि से चिरकाल तक मार्जन करने से मलिन दर्पण के स्वच्छ हो जाने पर उसमें मुख का प्रतिबिम्ब स्पष्ट पड़ने लगता है उसी प्रकार शुद्ध चित्त में ज्ञान का आविर्भाव हो जाता है।
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