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प्रबोधसुधाकर • अध्याय 16 • श्लोक 14
मृदुभाषिता प्रसादो निजनिन्दायां स्तुतौ समता । सुखदुःखशीतोष्णद्वन्द्वसहिष्णुत्वमापदो न भयम् ॥
मृदु भाषण करना, प्रसन्न-चित्त रहना, अपनी निन्दा और स्तुति में समान रहना, सुख-दुःख और शीतोष्णादि द्वन्द्वों को सहन करना, आपत्ति से भय न करना,
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