मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
प्रबोधसुधाकर • अध्याय 16 • श्लोक 17
तस्मिन्ननुभवति मनः प्रगृह्यमाणं परात्मसुखम् । स्थिरतां याते तस्मिन्याति मदोन्मत्तदन्तिदशाम् ॥
उस सत्वोद्रेक में रोककर रखा हुआ मन परमात्मसुख का अनुभव करता है। फिर उस (परमात्मसुख) के स्थिर हो जाने पर चित्त की अवस्था मतवाले हाथी के समान हो जाती है।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
प्रबोधसुधाकर के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

प्रबोधसुधाकर के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें