उस सत्वोद्रेक में रोककर रखा हुआ मन परमात्मसुख का अनुभव करता है। फिर उस (परमात्मसुख) के स्थिर हो जाने पर चित्त की अवस्था मतवाले हाथी के समान हो जाती है।
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