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प्रबोधसुधाकर • अध्याय 16 • श्लोक 8
कृश्णकथासंश्रवणे महोत्सवः सत्यवादश्च । परयुवतौ द्रविणे वा परापवादे पराङ्मुखता ॥
भगवत्कथाओं के सुनने में अत्यन्त उत्साह रखना, सत्य भाषण करना तथा परखी, परधन और परनिन्दा से दूर रहना,
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