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अध्याय 80 — अथ रत्नपरीक्षाध्यायः

बृहत्संहिता
18 श्लोक • केवल अनुवाद
शुभ रत्न धारण करने से राजाओं का शुभ और अशुभ रत्न धारण करने से राजाओं का अशुभ होता है। इसलिये रत्नज्ञों के द्वारा रत्नगत दैव (शुभाशुभ फल) को परीक्षा करनी चाहिये।
हाथी, घोड़ा, खो आदि में अपने-अपने गुण की विशेषता से 'रत्न' शब्द का प्रयोग होता है; जैसे गजरत्न, अश्वरत्न, ररीरत्न आदि। किन्तु यहाँ पर वज्र आदि पाषाणरलों का अधिकार है।
किसी का भत है कि मतसंज्ञक वैच्च से रत्न परे उत्पत्ति हुई है। कोई दधीचि मुनि की अरिय से रलोत्पत्ति मानते है। कोई ध्वी के स्वभाव से उपलों में विचित्रता आकर रत्न हो जाता है-ऐसा मानते है।
पढ़ (होरा), इन्द्रनील (नीलम), मरकत (प), कला, पण, भिर वैदूर्य, पुलक, विपालक, राजमणि स्कटिक द्रकान्त,
भौगन्धिक, गोमेद, शङ्ख महानील, पुष्पराज, उद्यमनि, ज्योतीस, सस्य मुख्य (यो) लाइन बो को' कहते हैं।
वेणा नदी के तट पर सर्वथा शुद्ध, कौशल देश में शिरीष पुष्प के समान, सौराष्ट्र देश में कुछ लाल, सूरपारक देश में काला, हिमवान् पर्वत पर
कुछ लाल, मतङ्ग देश में वल्लपुष्य के समान, कलिंग देश में पीले वर्ण का और पौण्ड्र देश में श्याम वर्ण का होरा उत्पन्न होता है।
छ: कोण वाले सफेद हीरे का इन्द्र, सर्पाकार मुख वाले काले होरे का यम, कदली- काण्ड के समान (नील-पीत) वर्ण वाले हीरे का विष्णु और सामान्य रूप से समस्त प्रकार के होरे का भी विष्णु ही देवता है।
स्त्री की भग के समान आकृति वाले होरे का वरुण, कर्णिकारपुष्प के समान, सिंघाड़े के समान (त्रिभुजाकार) या बाघ के नेत्र के समान हीरे का अग्नि तथा अशोक के पुष्प के
समान वर्ण वाले हीरे का वायव्य देवता है। नदी के प्रवाह, खान, प्रकीर्णक ( जिस भूमि में मणि होती है अर्थात् समुद्र आदि) - ये तीन हीरों की उत्पत्ति के आकरस्थान कहे गये हैं।
लाल और पीला होरा क्षत्रियों को, सफेद होरा ब्राह्मणों को, शिरीष-पुष्प के समान वर्ण वाला वैश्यों को और नीला हीरा शूद्रों को शुभ करने वाला होता है।
सफेद सरसों के आठ दाने का एक तण्डुल (चावल) होता है। २० तण्डुल होरे का मूल्य दो लाख कार्षापण होता है। उसमें क्रम से दो-दो चावल कम करने से पूर्वोक्त मूल्य का पादोन (डेढ़ लाख), तृतीयांशोन (१४४४४३३) अर्थोन (एक लाख), तृतीयांश (६६६६३३), पञ्चमांश (४००००), षोडशांश (१२५००)
पञ्च- विंशांश ( ८०००) शतांश (२०००) और सहस्रांश (१७०) कार्षापण मूल्य होता है अर्थात् १८ तण्डुलतुल्य हीरे का मूल्य १५००००, १६ तण्डुल होरे का मूल्य १४४४४३३, १४ तण्डुल हीरे का मूल्य १००००० कार्षापण इत्यादि जानना चाहिये।
जो होरा किसी भी वस्तु से टूटने वाला न हो, अल्प जल में भी किरण की तरह तैरता रहे, निर्मल हो एवं बिजली, अग्नि या इन्द्रधनुष के समान वर्ण वाला हो, वह कल्याणकारी कहा गया है।
काकपद के समान चिह्न वाला, मक्खी के समान चिह्न वाला, केश के समान रेखा- रूप चिह्न वाला, धातुओं (मिट्टियों) से युक्त, कंकड़ से विद्ध, कथित लक्षण से दुगुने कोण वाला, आग से जला हुआ, मलिन, कान्तिहीन एवं जर्जर हीरा शुभदायी नहीं होता है।
पानी के बुलबुले के समान आगे से फटा, चिपटा और वासी फल के समान लम्बा होरा शुभ करने वाला नहीं होता। इसलिये इन दोषयुक्त हीरों का मूल्य पूर्वोक्त मूल्य से अष्टमांश कम हो जाता है।
हीरा के लक्षणों को जानने वाले पण्डितों का कहना है कि पुत्र चाहने वाली स्त्रियों को किसी भी प्रकार का हीरा नहीं धारण करना चाहिये। सिंघाड़े को आकृति वाले तीन पुटों से युक्त, धान्यफल के समान या श्रोणी के समान होरे को धारण करना पुत्र चाहने वाली खियों के लिये शुभदायक होता है।
अशुभ लक्षणों से युक्त हीरे को धारण करने से राजाओं के बन्धु, धन और प्राण का नाश होता है तथा शुभ लक्षणों से युक्त हीरे को धारण करने से वज्रभय, विष एवं शत्रु का नाश तथा भोग की वृद्धि होती है।
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