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बृहत्संहिता • अध्याय 80 • श्लोक 2
द्विपहयवनितादीनां स्वगुणविशेषेण रत्नशब्दोऽस्ति । इह तूपलरत्नानामधिकारो वज्रपूर्वाणाम् ॥
हाथी, घोड़ा, खो आदि में अपने-अपने गुण की विशेषता से 'रत्न' शब्द का प्रयोग होता है; जैसे गजरत्न, अश्वरत्न, ररीरत्न आदि। किन्तु यहाँ पर वज्र आदि पाषाणरलों का अधिकार है।
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