Krishjan
🇺🇸 EN
🇮🇳 हिन्दी
मुख्य पृष्ठ
शास्त्र
परिचय
ऐप इंस्टॉल करें
मुख्य पृष्ठ
शास्त्र
परिचय
ऐप इंस्टॉल करें
अध्याय 60 — अथ प्रतिमाप्रतिष्ठापनाध्यायः
बृहत्संहिता
22 श्लोक • केवल अनुवाद
चार तोरणों से युत, प्रशस्त वृक्ष त के पत्रों से आच्छादित अधिवासन (संस्कारविशेष ) का मण्डप बनाना चाहिये।
मण्डप के पूर्व भाग में अनेक वर्ण की पुष्पमाला और पताका लगानी चाहिये तथा अग्निकोण में लाल, दक्षिण और नैऋत्य कोण में काली
पश्चिम में सफेद, वायव्य कोण में पाण्डुर (कुछ सफेद), उत्तर में अनेक वर्ण वाली और ईशान कोण में पीली पुष्पमाला और पताका लगानी चाहिये।
लकड़ी और मिट्टी की प्रतिमा आयु, श्री, बल और विजय प्रदान करती है। मणि की प्रतिमा लोगों के हित के लिये होती है। सोने की प्रतिमा पुष्टि देती है।
चाँदी की प्रतिमा यश प्रदान करती है। ताम्बे की प्रतिमा सन्तान की वृद्धि करती है। पत्थर की प्रतिमा या शिवलिङ्ग अत्यधिक भूमि का लाभ कराते हैं।
किसी प्रकार की कील से पीड़ित प्रतिमा प्रधान पुरुष और सन्तान का नाश करती है तथा किसी प्रकार के गड्ढे से युत प्रतिमा रोग, उपद्रव और मृत्यु को करती है।
अधिवासन मण्डप के मध्य में बनाये हुये स्थण्डिल को लीप कर उस पर रेत और रेत के ऊपर कुशा बिछा कर उसके ऊपर प्रतिमा को सुला देना चाहिये। प्रतिमा का शिर राजा के आसन पर और पाँव को तुकिये पर रखना चाहिये।
पाकर, पीपल, सिरस और बढ़ के पत्तों के काढ़े से; मंगलसंज्ञक (जया, जयन्ती, जीवन्ती, जीवपुत्री, पुनर्नवा, विष्णुक्रान्ता और लक्षमणा) सर्वोषधियों से;
हाथी और घोड़े से उखाड़ी हुई पर्वत की, वल्मीक की, नदियों के संगमस्थान की और कमलयुत सरोवर की मिट्टियों से; पश्चगव्ययुत तीर्थ के जल से तथा सुवर्ण और रत्नों के जल से
पूर्व दिशा में शिर है जिसका, ऐसी प्रतिमा को स्नान करा कर सुगन्ध द्रव्य, अनेक प्रकार के तुरही आदि वाद्य, पुण्याहवाचन और वेदध्वनियों से पूजा करनी चाहिये।
मुख्य ब्राह्मणों के द्वारा पूर्व दिशा में इन्द्र के और अग्नि कोण में अग्नि के मन्त्र का जप कराना चाहिये। तत्पश्चात् यजमान द्वारा उन ब्राह्मणों की दक्षिणा आदि से पूजा की जानी चाहिये।
जिस देवता की प्रतिष्ठा हो रही हो, उस देवता के मन्त्रों से ब्राह्मण के द्वारा हवन कराना चाहिये। इन्द्रध्वजाध्याय में अग्नि के शुभाशुभ लक्षण हमारे द्वारा कहे गये हैं। यदि हवन के समय अग्नि धूमयुत हो,
उसको ज्वाला वामावर्त क्रम से घूमती हो, बार- बार शब्द करती हो या उसमें चिनगारी उड़ती हो तो शुभ नहीं होता है तथा यदि हवन करने वाले की स्मृति का उस समय लोप हो जाय या प्रसर्पण हो जाय ( जहाँ पहले बैठा हो, वहाँ से सरक जाय तो भी शुभ नहीं होता है।
प्रतिष्ठा करने वाला पुरुष द्वारा स्नान कराई हुई, वस्त्र पहनाई हुई, भूषण पहनाई हुई, पुष्प और सुगन्धित द्रव्यों से पूजा की हुई प्रतिमा को सुन्दर बिछी हुई शय्या पर स्थापित करना चाहिये।
सोई हुई प्रतिमा को गीत, नृत्य और जागरण के द्वारा अधिवासन करके दैवज्ञों के द्वारा प्रतिपादित मुहूर्त में उसकी प्रतिष्ठा करनी चाहिये।
उस प्रतिमा का पुष्य, वस्त्र, चन्दन और सुगन्धित द्रव्यों से पूजन करके शंख और तुरही के शब्दों के साथ अधिवासन मण्डप से प्रदक्षिण क्रम से प्रासाद के अन्दर प्रवेश कराना चाहिये।
तत्पश्चात् वहाँ पर अनेक प्रकार की बलि देकर वस्त्र, दक्षिणा आदि से सभ्य जनों का पूजन करके, सोने का टुकड़ा देकर पिण्डिका के गड्ढे में प्रतिमा का स्थापन करना चाहिये।
प्रतिष्ठा करने वाले मनुष्य को ज्यौतिषी, सभ्य मनुष्य, कारीगर- इन सबों का विशेष रूप से पूजन करना चाहिये। इस तरह करने वाला मनुष्य इस लोक में कल्याणों का भागी होता है और परलोक में स्वर्ग प्राप्त करता है।
विष्णु की प्रतिष्ठा वैष्णव, सूर्य की प्रतिष्ठा भगब्राह्मण, शिव की प्रतिष्ठा भस्म लगाने वाले ब्राह्मण, मातृकाओं की प्रतिष्ठा रण्डलक्रम जानने वाले ब्राह्मण, ब्रह्मा की प्रतिष्ठा ब्राह्मण, जितेन्द्रिय बुद्ध की प्रतिष्ठा रक्तपटधारी और जिन की प्रतिष्ठा दिगम्बर क्षपणक को करनी चाहिये। जो मनुष्य जिस देवता का परम उपासक हो, उसे उस देवता की क्रिया करनी चाहिये।
उत्तरायण में, शुक्ल पक्ष में, चन्द्र और गुरु के षड्वर्ग में, स्थिर लग्न में, स्थिर नवांश में, शुभ ग्रह पञ्चम, नवम, लग्न, चतुर्थ, सप्तम और दशम स्थान में हों, पापग्रह तृतीय, षष्ठ, दशम और एकादश
में हों, तीनों उत्तरा, रोहिणी, मृगशिरा, रेवती, चित्रा, अनुराधा, श्रवण, पुष्य और स्वाती नक्षत्रों में, मंगल को छोड़कर शेष दिनों में और प्रतिष्ठा करने वाले के लिये शुभदायक समयों में देवता का स्थापन करना कल्याणकारी होता है।
इस प्रकार यह संक्षेप में सामान्य रूप से प्रतिमा का प्रतिष्ठापन-विधान मैंने कहा है। सूर्य की प्रतिमा का अधिवासन और प्रतिष्ठापन-विधान सौर शास्त्र में अलग से कहा गया है।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें