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बृहत्संहिता • अध्याय 60 • श्लोक 11
ऐन्द्रयां दिशीन्द्रलिङ्गा मन्त्राः प्राग्ट्रविणेऽग्निलिङ्गाश्च । वक्तव्या द्विजमुख्यैः पूज्यास्ते दक्षिणाभिश्च ॥
मुख्य ब्राह्मणों के द्वारा पूर्व दिशा में इन्द्र के और अग्नि कोण में अग्नि के मन्त्र का जप कराना चाहिये। तत्पश्चात् यजमान द्वारा उन ब्राह्मणों की दक्षिणा आदि से पूजा की जानी चाहिये।
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