द्विपवृषभोजूतपर्वतवल्पीकसरित्समागमतटेषु पद्मसरःसु च वृद्धिः सपश्चगव्यैश्च तीर्थजलैः ॥
हाथी और घोड़े से उखाड़ी हुई पर्वत की, वल्मीक की, नदियों के संगमस्थान की और कमलयुत सरोवर की मिट्टियों से; पश्चगव्ययुत तीर्थ के जल से तथा सुवर्ण और रत्नों के जल से
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