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अध्याय 17 — अथ प्रहयुद्धाध्यायः

बृहत्संहिता
27 श्लोक • केवल अनुवाद
जिस समय जिस प्रकार से ताराग्रहों का युद्ध त्रिकालज्ञों ने कहा है, उसको सूर्यसिद्धान्त से लेकर मैंने करण (पञ्चसिद्धान्तिका) में कहा है।
आकाश में चलते हुये, ऊपर-ऊपर अपने-अपने मार्ग में स्थित, अत्यन्त दूर से देखने के कारण समान की तरह प्रतीत होने वाले ग्रहों के पराशर आदि मुनियों ने आसत्र- क्रम योग के भेद से भेद, उल्लेख, अंशुमर्दन, अपसव्यये चार प्रकार के ग्रहयुद्ध कहे हैं।
विशेष-अपःस्थित विम्प से ऊध्यस्थित चिम्ब के आच्छादित होने से भेद, एक विम्वपरिधि से दूसरे को विम्बपरिधि का स्पर्श करे तो उल्लेख, आसप्रस्थित दोनों ग्रहों के परस्पर किरण का संयोग होने से अंशुमर्दन और ठोक दक्षिणोत्तर में स्थित होने से अपगव्य नामक ग्रहयुद्ध होता है।
यदि भेदयुद्ध हो तो वर्षा का नारा तथा मित्र और उत्तम कुलोत्पन्न मनुष्यों में परस्पर भेद होता है। उल्लेखयुद्ध हो तो शत्रभय, मन्त्रियों में विरोध और दुर्भिक्ष होता है।
में परस्पर युद्ध, शस्र, रोग और क्षुधाओं से मनुष्य को अत्यन्त पीड़ा होती है तथा अपसव्ययुद्ध (कोई ग्रह किसी ग्रह के दक्षिण पार्श्व से आगे होकर वाम पार्श्वगत हो तो) राजाओं में परस्पर युद्ध होता है।
सूर्य मध्याह्न समय में आक्रन्द, पूर्व में पौर और पश्चिम में यायी होता है। बुध, बृहस्पति और शनि सदा पौर, चन्द्र आक्रन्द तथा केतु, मंगल, राहु और शुक्र यायी संज्ञक हैं। ये ग्रह पौड़ित हों तो आक्रन्द, यायी और पौरों का नाश करते हैं;
(रक्षक आदि 'आराबे रुदिते त्रातांर्याक्रन्द' इत्यमरः) का, यायो- संज्ञक पीड़ित हो तो यायी (गमन करने वालों) का और पौरसंज्ञक ग्रह पीड़ित हो तो पुरवासियों का नारा करता है तथा विजयी हों तो अपने वर्ग की विजय करते हैं।
यदि पौर ग्रह से पौर ग्रह पीड़ित हो तो पुरवासी राजाओं से पुरवासी राजा का नाश होता है। इसी तरह यायी ग्रह से आक्रन्द ग्रह पीड़ित हो तो यायी मनुष्य से आक्रन्द मनुष्य का और आक्रन्द ग्रह से यायो पोड़ित हो तो आक्रन्द से यायो का नाश होता है तथा नागर ग्रह से यायी पीड़ित हो तो नागर मनुष्य से यायो का और यायी ग्रह से नागर ग्रह पीड़ित हो तो पायी मध्य से नागर मनुष्य का नाश होता है।
बक्षिण दिशा में स्थित, रुक्ष, कम्पायमान, दूसरे ग्रह के पास में नहीं जाकर लौटने बाला, सूक्ष्म विम्ब बाला, अन्य ग्रह से आक्रान्त, विकारयुत, किरणरहित, विवर्ण-इन लक्षणों से युत ग्रह पराजित होते हैं।
पूर्वोक्त लक्षण से विपरीत लक्षणयुत (उत्तर दिशा में स्थित, स्निग्ध, कम्पन से रहित, दूसरे ग्रह को प्राप्त करने वाला, ऊपर में स्थित और तेजस्वी) हो तथा दक्षिण में स्थित होने पर भी यदि विपुल, निर्मल, कान्तियुत विम्ब वाला ग्रह हो तो विजयी होता है।
यदि समागम-समय में दोनों ग्रह किरणयुक्त, विपुल या स्निग्ध हों तो दोनों ग्रहों के चों में प्रीति और विपरीत हो तो अपने-अपने पक्षों का नाश करते हैं।
युद्ध (भौम आदि ग्रहों का परस्पर युद्ध) और समागम (चन्द्र के साथ सम्मेलन ) यदि अपने-अपने उक्त लक्षणों से अव्यक्त (अप्रकाशित) हो (जैसे युद्ध में कौन ग्रह "विनयों और कौन ग्रह पराजित है- इसका ज्ञान न होता हो) तथा समागम में ग्रह से चैन्द्रमा न उत्तर न दक्षिण; किन्तु मध्य में होकर गमन करते हो, तो पृथ्यों पर राजाओं को भी अव्यक्त (सन्दिग्धात्मक) फल कहना चाहिये ।
यदि मङ्गल बृहस्पति से पराजित हो तो वाहील देश में निवास करने वाले, विजय को इच्छा करने वाले, अग्नि से जीवनयात्रा चलाने कले- ये सब पीड़ित होते हैं। यदि बुध से पराजित हो तो सूरसेन, कलिङ्ग और शाल्व देश में रहने वाले मनुष्य पीड़ित होते हैं।
यदि शनैश्वर से पराजित हो तो नगरों में निवास करने वाले विजयी और प्रजागण दुःखो होते हैं। यदि शुक्र से पराजित हो तो कोष्ठागार (अन्तर्ग्रह 'पुंसि कोष्ठोऽन्तर्जठर कुसूलो ऽन्तर्ग्रहन्तथा' इत्यमरः), म्लेच्छ जाति और क्षत्रिय पीड़ित होते हैं।
यदि मङ्गल से बुध पराजित हो तो नदी, तपस्वी, अश्मक देश में निवास करने वाले, राजा, उत्तर दिशा में निवास करने वाले और यज्ञ में दीक्षित मनुष्य पीड़ित होते हैं।
यदि बृहस्पति से पराजित हो तो म्लेच्छ जाति, शुद्र जाति, चोर, धनी, पुरों में रहने वाले, त्रिगर्त देश में रहने वाले और पर्वत पर निवास करने वाले पीड़ित होते हैं तथा भूकम्प होता है।
यदि शनैश्चर से पीड़ित हो तो नाव चलाने वाले, योध (शत्रु वृत्ति वाले), जल से उत्पन्न बस्तु, धनी और गर्भिणी खो पीड़ित होतो है। यदि शुक्र से पराजित बुध हो तो अग्नि का प्रकोप, धान्य, मेच और गमन करने वाले राजाओं का नाश होता है।
यदि शुक्र से बृहस्पति पराजित हो तो कुलूत, गान्धार, कैकय, मद्र, शाल्व, वत्स और बङ्ग देश में निवास करने वाले मनुष्य, गौ तथा धान्य पीड़ित होते हैं। यदि मङ्गल से पराजित हो तो मध्य देश, राजा और गौ पीड़ित होती है।
शनि से पराजित हो तो यदि युध से पराजित हो तो म्लेच्छ जन, सत्य भाषण करने वाले, शख धारण करने बाले
मध्य देश का नाश होता है तथा गुरुभक्ति के फल (ग्रहभक्तियोगाध्यायोक्त गुरुभक्तिफल) का भी नाश होता है
यदि बृहस्पति से शुक्र पराजित हो तो यायी (नायक) और प्रधान जनों का नाश, ग्राह्मण और क्षत्रियों में परस्पर विरोध, अवृष्टि
कोशल, कलिङ्ग, वङ्ग, वत्स, मत्स्य और मध्य देश में निवास करने वाले मनुष्य, नपुंसक तथा शूरसेन देश में स्थित मनुष्य पीड़ित होते हैं।
दि मङ्गल से पराजित हो तो सेनापति का मरण और राजाओं में परस्पर युद्ध होता है। यदि बुध से पराजित हो तो पर्वत पर निवास करने वालों का नाश, गौओं के दूध का नाश और थोड़ी दृष्टि होती है।
यदि शनैश्चर से पराजित शुक्र हो तो सद्धियों में प्रधान, शख से आजीविका चलाने वाले, क्षत्रिय वर्ग और जल में उत्पत्र वस्तु पीड़ित होती है।
यदि शुक्र से पराजित शनि हो तो सभी द्रव्यों में मौल्य की वृद्धि, सर्प, पक्षी और मानियों को पोड़ा होती है। यदि मङ्गल से पराजित हो तो तङ्गण, आन्ध्र, उडू, काशी और बाहीक देश में निवास करने वालों को पीड़ा होती है
यदि बुध से पराजित हो तो अङ्ग देश में निवास करने वाले, क्रय-विक्रय से आजीविका चलाने वाले, पक्षी, पशु और हाथी पीड़ित होते हैं। यदि गुरु से पराजित शनि हो तो अधिक स्त्री वाला देश, महिषक देश में रहने वाले और शक देश में रहने वाले पीड़ित होते हैं।
मङ्गल, बुध, बृहस्पति, शुक्र और शनि के ये विशेष फल कहे गये हैं, अवशिष्ट फल ग्रह की भक्ति से कहना चाहिये। जिस तरह व्यक्त या अव्यक्त रूप से ग्रह पीड़ित होते हैं, उसी प्रकार व्यक्त या अव्यक्त रूप से अपनी भक्ति का भी नाश करते हैं।
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