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बृहत्संहिता • अध्याय 17 • श्लोक 7
केतुकुजराहुशुक्रा यायिन एते हता घ्नन्ति । आक्रन्दयायिपौरान् जयिनो जयदाः स्ववर्गस्य ॥
(रक्षक आदि 'आराबे रुदिते त्रातांर्याक्रन्द' इत्यमरः) का, यायो- संज्ञक पीड़ित हो तो यायी (गमन करने वालों) का और पौरसंज्ञक ग्रह पीड़ित हो तो पुरवासियों का नारा करता है तथा विजयी हों तो अपने वर्ग की विजय करते हैं।
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