युद्धं समागमे वा यद्यव्यक्ती स्वलक्षणैर्भवतः । भुवि भूभृतामपि तथा फलमव्यक्तं विनिर्देश्यम् ॥
युद्ध (भौम आदि ग्रहों का परस्पर युद्ध) और समागम (चन्द्र के साथ सम्मेलन ) यदि अपने-अपने उक्त लक्षणों से अव्यक्त (अप्रकाशित) हो (जैसे युद्ध में कौन ग्रह
"विनयों और कौन ग्रह पराजित है- इसका ज्ञान न होता हो) तथा समागम में ग्रह से
चैन्द्रमा न उत्तर न दक्षिण; किन्तु मध्य में होकर गमन करते हो, तो पृथ्यों पर राजाओं को
भी अव्यक्त (सन्दिग्धात्मक) फल कहना चाहिये ।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
बृहत्संहिता के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
बृहत्संहिता के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।