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बृहत्संहिता • अध्याय 17 • श्लोक 2
वियति चरतां प्रहाणामुपर्युपर्यात्ममार्गसंस्थानाम् । अतिदूराद् दृग्विषये समतामिव सम्प्रयातानाम् ॥
आकाश में चलते हुये, ऊपर-ऊपर अपने-अपने मार्ग में स्थित, अत्यन्त दूर से देखने के कारण समान की तरह प्रतीत होने वाले ग्रहों के पराशर आदि मुनियों ने आसत्र- क्रम योग के भेद से भेद, उल्लेख, अंशुमर्दन, अपसव्यये चार प्रकार के ग्रहयुद्ध कहे हैं।
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