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अध्याय 9 — उदयास्ताधिकार:
सूर्य सिद्धांत
18 श्लोक • केवल अनुवाद
सूर्य की किरणों से आक्रान्त अल्प तेजवाले ज्योतिष्पिण्डों के उदय एवं अस्त कालज्ञान का विवेचन कर रहा हूँ। (अपनी-अपनी गति से भ्रमण करते हुए चन्द्र आदि ग्रह और नक्षत्रों का जब सूर्य से सान्निध्य होता है तब उनका सूर्यकिरणों में निमग्न होने के कारण दीखना बन्द हो जाता है इसी को अस्त कहते हैं तथा जब सूर्य से दूर हटकर दिखलाई देने लगते हैं तब उसे उदय कहते हैं)।
गुरु, भौम और शनि ये तीनों ग्रह सूर्य से राश्यादिमान में अधिक होने पर पश्चिम में अस्त तथा न्यून होने पर पूर्व में उदय होते हैं। इसी प्रकार वक्री शुक्र और बुध, सूर्य से अधिक होने पर पश्चिम में अस्त तथा न्यून होने पर पूर्व में उदय होते हैं।
शीघ्रगामी ग्रह चन्द्र, बुध और शुक्र सूर्य से न्यून होने पर पूर्व में अस्त होते हैं तथा सूर्य से अधिक होने पर पश्चिम में उदय होते हैं।
पश्चिम दिशा में ग्रहों का उदयास्त साधन करना हो तो सूर्यास्तकालिक, पूर्वदिशा में उदयास्त साधन करना हो तो सूर्योदय कालिक तथा दिन में इष्ट कालिक सूर्य और ग्रह का साधन करना चाहिये। तदनन्तर ग्रह में आयन और आशक्षदृक्कर्म का संस्कार करना चाहिये।
पूर्वोदयास्तसाधन करना हो तो सूर्य और दृग्ग्रह के “भोग्यासूनूनकस्याथ भुक्तासूनधिकस्य च” इत्यादि प्रकार से अन्तरासुओं का साधन कर तथा पश्चिमोदयास्तसाधन करना हो तो छ: राशियुत सूर्य और छ: राशियुत दूृग्ग्रह के अन्तरासुओं का साधन कर इन अन्तरासुओं में ६० का भाग देने से जो लब्धि प्राप्त हो उसे इष्टकालांश कहते हैं।
बृहस्पति के ११ शनि के १५ तथा मंगल के १७ कालांश होते हैं। (सूर्य से अपने-अपने कालांशों के तुल्य अन्तरित होने पर ग्रह उदय-अस्त होते हैं।)
शुक्र का (वक्री होने पर) नीचासन्न में बड़ा बिम्ब होता है, इसलिये पश्चिम में ८ अस्तकालांश और पूर्व में ८ उदय कालांश होता हैं। छोटे बिम्ब के कारण पूर्व में १० कालांशों से अस्त और पश्चिम में १० कालांशों से उदय होता है।
वक्री होने पर शीघ्रगति बुध का बड़ा बिम्ब होने के कारण पश्चिम में १२ कालांशों से अस्त और पूर्व में १२ कालांशों से उदय होता है। बुध का विम्ब छोटा होने से १४ कालांशों पर पूर्व में अस्त तथा पश्चिम में उदय होता है।
सूर्य के तीक्ष्ण किरणों से ढँके (ग्रस्त) हुए ग्रहों के बिम्ब अपने-अपने उक्त कालांशों से अधिक इष्टकालांश होने पर दर्शन योग्य होते हैं और न्यून इष्टकालांश होने पर अदृश्य होते हैं।
पाठपठित कालांश और इष्टकालांशों की अन्तर कलाओं में सूर्य और ग्रह की (वशक्ष्यमाण) कालगति की अन्तर कला का तथा वक्री ग्रह हो तो गतियोगकला का भाग देने से लब्ध फल गत-गम्य दिनादि होते हैं।
सूर्य और इष्टग्रह की कलात्मक गतियों को ग्रह्धिष्ठित राशि के लग्नोदयासुओं से पृथक्-पृथक् गुणाकर १८०० का भाग दें, लब्ध फल क्रम से सूर्य और ग्रह की कालगति होती हैं। इन कालगतियों से पूर्वोक्त प्रकार से पूर्वोक्त कालांशों के अन्तर द्वारा उठदय और अस्तकाल के गत-गम्य दिनादि का साधन करना चाहिए।
स्वाती, अगस्त्य, मृगव्याध, चित्रा, ज्येष्ठा, पुनर्वसु, अभिजित् और ब्रह्महदय के १३ कालांश होते हैं।
हस्त, श्रवण, पूर्वाफाल्गुनी, उत्तराफाल्गुनी, धनिष्ठा, रोहिणी और मघा के १४ कालांश, विशाखा, अश्विनी,
कृत्तिका, अनुराधा, मूल, आश्लेषा, आर्द्रा, पूर्वाषाढ़ा तथा उत्तराषाढ़ा के १५ कालांश,
भरणी, पुष्य और मृगशिरा के सूक्ष्म बिम्ब होने के कारण २१ कालांश हैं तथा शेष शततारा, पूर्वाभाद्रपदा, उत्तराभाद्रपदा, रेवती, अग्नि, ब्रह्म, अपांवत्स और आप के १७ कालांश हैं। ये सभी नक्षत्र और तारे अपने-अपने कालांशों के तुल्य सूर्य से अन्तरित होने पर दृश्य और अदृश्य होते हैं। अर्थात् कालांशों से अधिक अन्तरित होने पर दृश्य (उदय) और न्यून अन्तरित होने पर अदृश्य (अस्त ) होते हैं।
नक्षत्र और ताराओं के पूर्वोक्त कालांशों को १८०० से गुणाकर ग्रह की राशि के उदयासुओं से भाग देने पर भागफल उन नक्षत्र और तारों के क्षेत्रांश अर्थात् क्रान्तिवृत्ततत अंश होते हैं। उनसे ग्रहों की तरह नक्षत्र और तारों का भी उदय-अस्त साधन पूर्वोक्तरीति से करना चाहिए।
नक्षत्रों का पूर्व में उदय और पश्चिम में अस्त होता है। नक्षत्रों में पूर्ववत् आशक्षदृक्कर्म का संस्कार करना चाहिए। सदैव सूर्य की गति से ही गत गम्य दिनादि का साधन होता है।
अभिजित्, ब्रह्महदय, स्वाती, श्रवण, धनिष्ठा तथा उत्तराभाद्रपदा का उत्तर शर अधिक है इसलिए ये कभी भी अस्त नहीं होते।
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