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सूर्य सिद्धांत • अध्याय 9 • श्लोक 15
भरणीतिष्यसौम्यानि सौक्ष्म्यात्‌ त्रि:सप्तकांशकै:। शेषाणि सप्तदशभिर्दृश्यादृश्यानि भानि तु ॥
भरणी, पुष्य और मृगशिरा के सूक्ष्म बिम्ब होने के कारण २१ कालांश हैं तथा शेष शततारा, पूर्वाभाद्रपदा, उत्तराभाद्रपदा, रेवती, अग्नि, ब्रह्म, अपांवत्स और आप के १७ कालांश हैं। ये सभी नक्षत्र और तारे अपने-अपने कालांशों के तुल्य सूर्य से अन्तरित होने पर दृश्य और अदृश्य होते हैं। अर्थात्‌ कालांशों से अधिक अन्तरित होने पर दृश्य (उदय) और न्यून अन्तरित होने पर अदृश्य (अस्त ) होते हैं।
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