नक्षत्रों का पूर्व में उदय और पश्चिम में अस्त होता है। नक्षत्रों में पूर्ववत् आशक्षदृक्कर्म का संस्कार करना चाहिए। सदैव सूर्य की गति से ही गत गम्य दिनादि का साधन होता है।
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