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सूर्य सिद्धांत • अध्याय 9 • श्लोक 17
नक्षत्राणामुदयास्त दिग्ज्ञानम्‌ प्रागेषामुदय: पश्चादस्तो दृक्‍कर्म पूर्ववत्‌ । गतैष्यदिवसप्राप्तिर्भानुभुक्‍त्या सदैव हि ॥
नक्षत्रों का पूर्व में उदय और पश्चिम में अस्त होता है। नक्षत्रों में पूर्ववत्‌ आशक्षदृक्कर्म का संस्कार करना चाहिए। सदैव सूर्य की गति से ही गत गम्य दिनादि का साधन होता है।
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