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अध्याय 4 — चन्द्रग्रहणाधिकार:

सूर्य सिद्धांत
26 श्लोक • केवल अनुवाद
सूर्यबिम्ब व्यास का प्रमाण ६५०० योजन तथा चन्द्रविम्ब का व्यास प्रमाण ४८० योजन है। इनके व्यास को अपनी अपनी स्पष्टागति से गुणाकर उसमें अपनी अपनी मध्यमागति से भाग देने पर इनके स्पष्ट विम्बव्यास होते हैं।
पूर्वोक्‍्त प्रकार से स्पष्ट किये हुए सूर्यबिम्ब के व्यास को रविभगण से गुणाकर चन्द्रभगण से भाग देने पर अथवा
चन्द्रकक्षा से गुणाकर सूर्यकक्षा से भाग देने पर लब्धि चन्द्रकक्षा में अथवा चन्द्राधिष्ठित आकाशगोल में स्पष्ट सूर्यविम्ब व्यास होता है। स्पष्ट सूर्यव्यास और चन्द्रव्यास में १५ का भाग देने से चन्द्रकक्षा में सूर्य और चन्द्र के कलादि व्यासमान होते हैं।
स्पष्टचन्द्रगति को भूव्यास से गुणाकर मध्यमचन्द्र गतिकला से भाग देने पर प्राप्त लब्धि सूची होती हैं।
सूर्य के स्पष्ट योजनात्मक बिम्ब में भूव्यास को घटा कर शेष को चन्द्र के मध्यम योजनात्मक बिम्बव्यास से गुणाकर सूर्य के मध्यम योजनात्मक बिम्बव्यास से भाग देने पर जो लब्धि प्राप्त हो उसको पूर्वसाधित सूची में घटाने से शेष तमोमय भूछाया होती है। इस भूछाया को पूर्वोक्‍्त प्रकार से कलात्मक करना चाहिये।
सूर्य से ६ राशि के (१८०) अन्तर में भूछाया भ्रमण करती है। सूर्य के तुल्य अथवा छ: राशि युक्त रवि (सषड्भसूर्य) के तुल्य या उससे कुछ न्यूनाधिक अंशों पर चन्द्रपात होने से ग्रहण होता है।
अमान्तकाल में सूर्य और चन्द्रमा के राश्यादि अवयव समान होते हैं। तथा पूर्णिमा के अन्त में सूर्य और चन्द्र के परस्पर ६ राशि के अन्तर पर रहने से इनके मात्र अवयवादि तुल्य होते हैं।
पर्व के दिन जिस काल में सूर्य और चन्द्रमा स्पष्ट किये गए हों उसके और अमान्त अथवा पूर्णिमान्त के बीच में जितनी गत-गम्य घटी हों उनका “इष्टनाडीगुणाभुक्ति:” इत्यादि प्रकार से जो फल प्राप्त हो उसको गत-गम्य घटिकाओं में क्रम से सूर्य और चन्द्रमा में हीन और युत करने से समकल होते हैं और पात में विलोम संस्कार करने से तात्कालिक पात होता है।
सूर्य से नीचे स्थित चन्द्रमा मेघ की तरह सूर्य का आच्छादक होता है। पूर्वाभिमुख भ्रमण करता हुआ चन्द्रमा भूच्छाया में प्रवेश करता है। जिससे चन्द्रग्रहण होता है।
छाद्य और छादक के मानैक्यार्ध (छाद्य विम्ब और छादक विम्ब के व्यास के योग का आधा) में तात्कालिक चन्द्रशर घटाने से शेष ग्रास प्रमाण होता है।
ग्राह्ममान से ग्रासमान अधिक हो तो सम्पूर्ण ग्रहण और न्यून हो तो न्यून (खण्ड) ग्रहण होता है। मानैक्यार्ध से शर अधिक होने पर ग्रहण सम्भव नहीं होता।
छाद्य और छादक बिम्बों के योग और अन्तर को पृथक पृथक्‌ आधा कर उनमे सें शर का वर्ग घटाकर शेष दोनों का वर्गमूल लें।
इन दोनों (वर्गमूलों) को ६० से गुणाकर सूर्य और चन्द्र के गत्यन्तर से भाग देने पर घटिकादि फल क्रम से स्थित्यर्ध विमर्दार्ध होते हैं। अर्थात्‌ उनमें योग के स्थान में स्थित्यर्ध और अन्तर के स्थान में मर्दार्ध होता है।
सूर्य-चन्द्र और पात की गतियों को पृथक-पृथक स्थित्यर्धवटिकाओं से गुणाकर ६० का भाग देने से जो कलादिफल प्राप्त हो उसको सूर्य और चन्द्र में घटाने से स्पर्शस्थित्यर्ध होता है। सूर्य और चन्द्रमा में जोड़ने से मोक्षस्थित्यर्ध होता है। तथा पात में विलोम अर्थात्‌ स्पर्शस्थित्यर्ध निमित्त योग और मोक्षस्थित्यर्ध हेतु अन्तर करना चाहिये।
इस प्रकार तात्कालिक सूर्य चन्द्र और पात होते हैं तात्कालिक चन्द्र और पात से पूर्वोक्तरीति से शर साधन कर स्पर्शस्थित्यर्ध और मोक्षस्थित्यर्ध का साधन करें। पुनः: इससे चालन देकर शर साधन कर स्पर्शस्थित्यर्ध और मोक्षस्थित्यर्ध का साधन करें। इस प्रकार असकृत्‌ कर्म करने से स्पर्शस्थित्यर्ध और मोक्षस्थित्यर्ध स्पष्ट होंगे। इसी प्रकार स्पर्शमर्दार्ध और मोक्षमर्दार्ध का भी साधन करना चाहिये।
स्पष्टतिथ्यन्तकाल में मध्यग्रहण होता है। स्पष्ट तिथ्यन्तकाल में स्पर्शस्थित्यर्घधधटिका घटाने से स्पर्श काल तथा मोक्षस्थित्यर्ध घटिका जोड़ने से मोक्षकाल होता है।
सम्पूर्ण ग्रहण में, स्पष्टतिथ्यन्तकाल में स्पर्शमर्दार्ध घटी को और मोक्षमर्दार्ध घटी को हीन-युत करने से क्रमश: सम्मीलन और उन्मीलनकाल होते हैं।
इष्ट घटयादिमान को स्पर्शस्थित्यर्ध घट्यादि में घटाने से जो शेष रहें उनको सूर्य-चन्द्र के गत्यन्तर से गुणाकर ६० का भाग देने पर, फल कोटिकला होती है। यहाँ ग्रहण के आरम्भ से मध्यग्रहणपर्यन्त इष्टघटिका होती हैं।
सूर्यग्रहण में पूर्वोक्त प्रकार से साधन की हुई कोटिकलाओं को मध्यस्थित्यर्ध से गुणाकर स्पष्टस्थित्यर्धथ का भाग देने से फल स्पष्टकोटिकला होती है।
भुज अर्थात्‌ तात्कालिक शर तथा पूर्वोक्‍्त प्रकार से साधन की हुई कोटि इन दोनों के वर्गयोग का वर्गमूल कर्ण होता है इस कर्ण को मानैक्यार्ध में घटाने से इष्टकालिक ग्रासमान होता है।
मध्यग्रहण (स्पष्टतिथ्यन्त काल) से आगे (मोक्षकाल से पूर्व) इष्टघट्यादि को मोक्षस्थित्यर्थ में घटाने से जो शेष हो उसे गत्यन्तर से गुणाकर ६० का भाग देने से कोटिकला प्राप्त होती है उससे पूर्वोक्त प्रकार से 'क्षेपो भुजस्तयोर्वर्गयुतेर्मूल श्रवस्तु तत्‌” इत्यादि से कर्ण लाकर कर्ण को मानैक्यार्ध में घटाने से शेष इष्टग्रास होता है।
मानैक्यखण्ड में इष्टग्रास को घटाकर शेष के वर्ग में तात्कालिक शर का वर्ग घटाकर, शेष का वर्गमूल लेने से चन्द्रग्रहण में कोटिलिप्ता होती हैं।
सूर्यग्रहण में इस प्रकार से प्राप्त कोटिकला को स्पष्टस्थित्यर्ध से गुणाकर मध्यस्थित्यर्ध का भाग देने से प्राप्त लब्धि स्पष्ट कोटिकला होती है। इन कोटिकलाओं को ६० से गुणाकर सूर्य-चन्द्र के गत्यंतर का भाग देने से प्राप्त घटिकादि लब्धि स्वकीय स्थित्यर्ध में घटा देने से शेष इष्टग्रास घटिका होती है।
सूर्यग्रहण में सूर्य की नतकालज्या को तथा चन्द्रग्रहण में चन्द्र की नतकालज्या को स्वदेशीय अक्षज्या से गुणाकर त्रिज्या से भाग देने से प्राप्त लब्धि का चाप पूर्व-पश्चिम नतज्या के क्रम से उत्तर-दक्षिण आक्षवलन होता है।
सत्रिभ (तीन राशि युक्त) ग्रह की क्रान्ति के तुल्य आयनवलन होता है। इन दोनों की एक दिशा होने पर योग तथा भिन्‍नदिशा होने पर अन्तर करने से फल स्पष्टवलन होता है। स्पष्टवलनज्या में ७० का भाग देने से अंगुंछादि वलन होता है।
दिनमान, दिनार्धभान और उन्नत घटिकाओं के योग में दिनमान के आधे का भाग देने से जो फल प्राप्त हो उससे पूर्व साधित विक्षेपादिकों में भाग देने से लब्ध फल उन विक्षेपादिकों के अंगुलादि मान होते हैं।
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