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सूर्य सिद्धांत • अध्याय 4 • श्लोक 15
तद्विक्षेपे: स्थितिदल॑ विमर्दार्ध तथाउसकृत्‌ । संसाध्यमन्यथा पाते तल्लिप्तादि फलं स्वकम्‌ ॥
इस प्रकार तात्कालिक सूर्य चन्द्र और पात होते हैं तात्कालिक चन्द्र और पात से पूर्वोक्तरीति से शर साधन कर स्पर्शस्थित्यर्ध और मोक्षस्थित्यर्ध का साधन करें। पुनः: इससे चालन देकर शर साधन कर स्पर्शस्थित्यर्ध और मोक्षस्थित्यर्ध का साधन करें। इस प्रकार असकृत्‌ कर्म करने से स्पर्शस्थित्यर्ध और मोक्षस्थित्यर्ध स्पष्ट होंगे। इसी प्रकार स्पर्शमर्दार्ध और मोक्षमर्दार्ध का भी साधन करना चाहिये।
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