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सूर्य सिद्धांत • अध्याय 4 • श्लोक 21
इष्ट ग्रासानयने विशेष: मध्य ग्रहणतश्चोध्व॑मिष्टनाडीरविशोधयेत्‌ । स्थित्यधन्मौक्षिकाच्छेषं प्राग्वच्छेष॑ तु मौक्षिके ॥
मध्यग्रहण (स्पष्टतिथ्यन्त काल) से आगे (मोक्षकाल से पूर्व) इष्टघट्यादि को मोक्षस्थित्यर्थ में घटाने से जो शेष हो उसे गत्यन्तर से गुणाकर ६० का भाग देने से कोटिकला प्राप्त होती है उससे पूर्वोक्त प्रकार से 'क्षेपो भुजस्तयोर्वर्गयुतेर्मूल श्रवस्तु तत्‌” इत्यादि से कर्ण लाकर कर्ण को मानैक्यार्ध में घटाने से शेष इष्टग्रास होता है।
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