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अध्याय 6 — षष्ठोऽध्यायः

श्वेताश्वतर
22 श्लोक • केवल अनुवाद
तत्त्वद्रष्टाओं के एक मतानुसार (जगत् का कारण) 'प्रकृति' एवं 'स्व-भाव' है, अन्य मत के अनुसार 'स्व-भाव' नहीं, 'काल' कारण है; ये दोनों ही इस विषय में भ्रमित तथा मोहवशीभूत हैं। जगत् में यह तो 'ईश्वर' की 'महिमा' है जिसके द्वारा यह 'ब्रह्मचक्र' (परमशाश्वत-चक्र) निरन्तर घुमाया जा रहा है।
'वह' इस सम्पूर्ण 'विश्व' को 'अपने आप' से सदैव ही आवृत किये रहता है, 'वह' ही सर्वज्ञ है 'वह' ही 'काल' का 'कर्ता' (रचयिता) है, 'प्रकृति' के गुणों का 'वही' आधान है, 'वह' सभी पदार्थों का ज्ञाता है, उसके ही शासन से 'कर्म-विधान' के चक्र का विवर्तन होता है, तुम सोचोगे कि पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु तथा आकाश-ये ही वे तत्त्व हैं जिनमें यह विधान-चक्र घूमता है।
'ईश्वर' कर्म करता है, तथा अपने कर्मों से पुनः निवृत्त हो जाता है 'वह' एक अथवा दो अथवा तीन अथवा आठ (अर्थात् चाहे जितने) तत्त्वों के 'तत्त्व' से 'स्वयं' को जोड़ लेता है, उसी तरह वह 'काल' से स्वयं को जोड़ लेता है एवं 'आत्मा' के सूक्ष्म गुणों तथा कर्मों के साथ 'स्वयं' को जोड़ लेता है।
इस प्रकार 'वह' उन कर्मों का आरम्भ करता है, जो प्रकृति के गुणों के अधीन हैं तथा समस्त सत्ताओं को उनके कर्मों में नियुक्त कर देता है: और जब ये सब सत्ताएँ नहीं रहतीं तब उस कर्म का लोप (नाश) हो जाता है; एवं कर्म के क्षय होने से 'वह' उनसे प्रयाण कर जाता है; क्योंकि 'अपने' परम सत्य स्वरूप में, तत्त्वतः 'वह' उनसे भिन्न है।
अहो, हमने 'उस' (ईश्वर) का दर्शन किया है और 'वह' समस्त जगत का 'आदि' है तथा समस्त 'कारणों' निमित्तों का 'परमहेतु' है, जिससे सकल पदार्थों का संयोग (परस्पर मिलन) होता है तथा वे रूप ग्रहणं करते हैं; भूत, वर्तमान एवं भविष्य-त्रिकाल, 'जिसके' ऐहिक आयाम हैं तथा 'जो' 'अकाल' है अर्थात् 'काल' का उसमें कोई स्थान नहीं है। हम अपने चित्त में स्थित उस 'पूर्वपुरुष' की उपासना करें। हम उस 'विश्वरूप' धारण करने वाले एवं सम्पूर्ण जगत् (भव) में 'सम्भूति' बनकर प्रकट होने वाले वन्दनीय 'देव' की आराधना करे।
'वह' 'काल', 'आकृति' तथा 'सृष्टि के वृक्ष' से परे, उनसे अधिक कुछ है तथा यह सम्पूर्ण 'प्रपञ्च' (जगत्) 'उससे' ही आरम्भ होता है। हम इस कृपा तथा महिमा (भग) के 'ईश' को जान जायेंगे क्योंकि 'वह' अपने हाथों में धर्म को वहन करते हुए तथा 'पाप' को उसके सुदृढ स्थानों से परे हटाते हुए हमारे पास आता है। हम 'उसे' जान जायेंगे क्योंकि 'वह' हमारी ही 'आत्मा' में स्थित है, अमृत-स्वरूप है एवं सम्पूर्ण 'विश्व' का परम-धाम है।
हम उन महाशक्तिशाली 'महेश्वर' को जानेंगे जो समस्त शक्तिशाली ईशों से भी उच्चतर 'परम ईश' हैं, उन्हें, जो देवताओं के 'परम देव' हैं, जो अधिपतियों के भी 'अधिपति' हैं, जो प्रभुओं के भी 'प्रभु' हैं, जो उच्चतम महानताओं से भी परे, उससे भी उच्चतर हैं। हम उन 'देव' को जानें जो 'भुवनेश'-इस जगत् के ईश्वर हैं, तथा जो सभी के द्वारा आराध्य हैं।
उस 'देव' का करणीय कर्म कुछ है ही नहीं, न ही उसके कर्म का कोई करण (साधनभूत अंग) है, न ही कोई 'उससे' बढ़कर है न ही हमें 'उसके' समान कोई दिखायी पड़ता है-क्योंकि 'उसकी' शक्ति अन्य सबसे बहुत अधिक बढ़कर, सबसे परे है, मनुष्य केवल विविध नामों तथा विविध रूपों में उसका वर्णन सुनते हैं। वस्तुतः 'उसका' बल, 'उसकी' क्रियाएँ तथा 'उसका' ज्ञान स्वभावतः आत्म-समर्थ तथा स्वयं ही स्वयं का कारण हैं।
इस लोक में 'उसका' कोई स्वामी नहीं है, न ही कोई 'उसके' ऊपर शासनकर्ता है। न हीं 'उसका' कोई रूप है न कोई लिंग है; क्योंकि 'वह' स्वयं ही उत्पत्ति का कारण तथा प्रकृतिगत करणों (साधनों) के अधिपतियों का 'अधिपति' है, किन्तु न कोई उसका जनक (उत्पत्तिकर्ता) है न ही कोई 'उसका' अधिपति-स्वामी है।
जिस प्रकार मकड़ी अपने ही अन्दर से अपना जाल निकालकर चुनती है, उसी प्रकार 'एकमेव देव' (ईश्वर) है तथा उसके अतिरिक्त अन्य कोई सत्ता नहीं है, किन्तु 'उसने' 'स्वयं' को अपने ही द्वारा प्रधान तत्त्व अर्थात् प्रकृति तत्त्व के तन्तुओं से चुने हुए जाल से ढक दिया है। वह 'एकमेव देव' हमारे लिए अपने शाश्वत स्वरूप, 'ब्रह्म' में लय का विधान करे।
उस 'एकमेव देव' का ही अस्तित्व है, प्रत्येक प्राणी में 'वही' मूढ रूप से छिपा हुआ है क्योंकि 'वही' सर्वव्यापी एवं समस्त प्राणियों का 'अन्तरात्मा' है, 'वह' सभी कर्मों का अध्यक्ष-स्वामी है, एवं सभी जीवसत्ताओं का आवास है। 'वही' सकल जगत-व्यापारों का 'महान् साक्षी' है जो विचारों में परस्पर सम्बद्धता लाता है, 'वह' है 'निरपेक्ष' एवं निर्गुण, जिसमें न कोई मनोभाव है न कोई गुण है।
वह 'एकमेव' 'ईश्वर' जो अकेला ही ऐसी अनेक निष्क्रिय सत्ताओं को अपने वश में रखता है जिनका अपना न कोई पृथक् कार्य है न कोई पृथक् उद्देश्य; 'वह' एक ही बीज को बहुविध प्राणियों के रूप में विकसित करता है; सुदृढमना, धीर पुरुष उस 'ईश्वर' का अपनी ही 'आत्मा' में साक्षात्कार करते हैं अतः उनको शाश्वत सुख, आनन्द प्राप्त होता है, अन्य को नहीं।
यह सब जो अनित्य है, अर्थात् अस्थायी एवं असत् है, उसमें 'वही' एकमात्र 'नित्यतत्त्व' है, समस्त चेतनताओं में वही 'एकमात्र' 'चेतन-तत्त्व' है; अनेकों की कामनाओं को 'वही' 'एक' परिपूर्ण करता है; 'वही' एकमात्र 'मूलकारण-स्वरूप' है जिस पर सांख्य एवं योग हमें ले जाते हैं। यदि तुम इस 'देव' (ईश्वर) को जान लो तो तुम समस्त बन्धनों से मुक्त हो जाओगे।
वहाँ न सूर्य प्रकाशित होता है न चन्द्र ही भासमान् है; तारे वही अन्धवत् हो जाते हैं; वही यह विद्युत् की चमक भी 'उसे' उद्भासित नहीं करती, किसी पार्थिव अग्नि का तो प्रश्न ही नहीं है; जो कुछ भी भास्वर है वह 'उसकी' ज्योति की ही प्रतिच्छाया है तथा 'उसी' की दीप्ति से यह सम्पूर्ण जगत् देदीप्यमान् हो रहा है।
इस सम्पूर्ण विश्व के अन्तर में 'एक' 'हंसस्वरूपी आत्मसत्ता' है एवं 'वह' अग्निस्वरूप' है जो जल की अतल गहराई में स्थित है। 'उसका' ज्ञान प्राप्त करके व्यक्ति मृत्यु की पकड़ से परे चला जाता है तथा इस महद्-गति के लिए दूसरा कोई मार्ग नहीं है।
'वह' ही सर्वस्रष्टा तथा 'वह' ही सर्वश है; क्योंकि 'वह' ही योनि (गर्भ) है जिससे 'आत्मा' प्रकट होती है; प्रकृति के 'गुणों' से सम्पन्न 'वह' 'काल' को रचने वाला बन जाता है तथा सर्वविद् 'वह' प्रत्येक वस्तु को जानता है। भौतिक जगत् 'उसका' विषय-क्षेत्र है एवं 'जीवात्मा' है उस क्षेत्र को जानने वाला 'क्षेत्रज्ञ' तथा 'प्रकृति' के गुण उसके दास हैं अर्थात् गुणों का वह ईश-स्वामी है। अतः इस संसार में सम्भूति तथा इस जगत् से मोक्ष का 'वही' हेतु है- और 'उसी' के कारण उनकी स्थिति है तथा 'उसी' के कारण उनका बन्धन है।
'वह' अमृतस्वरूप है क्योंकि 'वह' विशुद्ध सत् है; किन्तु 'वह' ईश्वर में निवास करता है तथा 'परम ज्ञाता' है वह 'सर्वत्र विद्यमान' है जो 'अपने' इस विश्व की रक्षा करने वाला है। वह इस गतिमय जगत् पर नित्य-निरन्तर शासन करता है, और इस ईशस्वरूप शासकत्व का अन्य कोई स्रोत नहीं है।
जो सृष्टि के पूर्व 'सृष्टिकर्ता ब्रह्मा' का विधान करता है तथा जो वेदों को उन्हें (ब्रह्मा को) प्रदान करता है, जो 'आत्मा' तथा 'बुद्धि' प्रकाशित हो रहा है, मैं मोक्ष की कामना से उसी 'देव' को जाता हूँ।
जब मानव सन्तति आकाश को चर्म के समान आवेष्टित करके धारण करेगी तथा द्युलोकों को परिधान के समान अपने ऊपर लपेट लेगी, केवल तब अपने 'प्रभु', 'ईश्वर' के ज्ञान के बिना ही 'जगत्' के दुःखों का अन्त हो जायेगा।
अपनी भक्ति के तप (ऊर्जाशक्ति) से तथा परमेश्वर की कृपा से श्वेताश्वतर ने तब अपनी चेतना में 'ब्रह्म' को जाना तथा उसने लौकिक जीवन का परित्याग करने वालों के पास आकर उन्हें उस 'परमोच्च' एवं 'पवित्र परमेश्वर' के विषय में सम्यक् रूप से प्रवचन किया जिसमें ऋषि-संघ सर्वदा आश्रय ग्रहण करते हैं।
यही है वेदान्त का परम गुह्य-सत्य जो प्राचीन कल्प में घोषित किया गया था, इस ज्ञान को व्यर्थ गवांने के लिए अशान्तमना, अपुत्र अथवा अशिष्य अर्थात् जिसका कोई शिष्य न हो, ऐसे व्यक्तियों को नहीं दिया जाना चाहिये।
किन्तु जिसके हृदय में 'ईश्वर' के प्रति परम प्रेम तथा परमा भक्ति है तथा जैसी 'ईश्वर' के प्रति है वैसी ही 'गुरु' के प्रति भी है, ऐसे 'महात्मा' पुरुष को जब ये महान् विषय बताये जाते हैं, वे स्वतः अपने आन्तर अर्थों को उद्घाटित कर देते हैं, सचमुच, उस 'महात्मा' के लिए वे स्वतः प्रकाशित हो जाते हैं।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
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