यह सब जो अनित्य है, अर्थात् अस्थायी एवं असत् है, उसमें 'वही' एकमात्र 'नित्यतत्त्व' है, समस्त चेतनताओं में वही 'एकमात्र' 'चेतन-तत्त्व' है; अनेकों की कामनाओं को 'वही' 'एक' परिपूर्ण करता है; 'वही' एकमात्र 'मूलकारण-स्वरूप' है जिस पर सांख्य एवं योग हमें ले जाते हैं। यदि तुम इस 'देव' (ईश्वर) को जान लो तो तुम समस्त बन्धनों से मुक्त हो जाओगे।
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