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श्वेताश्वतर • अध्याय 6 • श्लोक 18
यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्वं यो वै वेदांश्च प्रहिणोति तस्मै। तह देवंआत्मबुद्धिप्रकाशं मुमुक्षुर्वै शरणमहं प्रपद्ये॥ निष्कलं निष्क्रिय शान्तं निरवद्यं निरञ्जनम्‌। अमृतस्य पर सेतुं दग्धेन्दनमिवानलम्‌॥
जो सृष्टि के पूर्व 'सृष्टिकर्ता ब्रह्मा' का विधान करता है तथा जो वेदों को उन्हें (ब्रह्मा को) प्रदान करता है, जो 'आत्मा' तथा 'बुद्धि' प्रकाशित हो रहा है, मैं मोक्ष की कामना से उसी 'देव' को जाता हूँ।
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