न तस्य कार्यं करणं च विद्यते न तत्समश्चाभ्यधिकश्च दृश्यते।
परास्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते स्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया
उस 'देव' का करणीय कर्म कुछ है ही नहीं, न ही उसके कर्म का कोई करण (साधनभूत अंग) है, न ही कोई 'उससे' बढ़कर है न ही हमें 'उसके' समान कोई दिखायी पड़ता है-क्योंकि 'उसकी' शक्ति अन्य सबसे बहुत अधिक बढ़कर, सबसे परे है, मनुष्य केवल विविध नामों तथा विविध रूपों में उसका वर्णन सुनते हैं। वस्तुतः 'उसका' बल, 'उसकी' क्रियाएँ तथा 'उसका' ज्ञान स्वभावतः आत्म-समर्थ तथा स्वयं ही स्वयं का कारण हैं।
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