अपनी भक्ति के तप (ऊर्जाशक्ति) से तथा परमेश्वर की कृपा से श्वेताश्वतर ने तब अपनी चेतना में 'ब्रह्म' को जाना तथा उसने लौकिक जीवन का परित्याग करने वालों के पास आकर उन्हें उस 'परमोच्च' एवं 'पवित्र परमेश्वर' के विषय में सम्यक् रूप से प्रवचन किया जिसमें ऋषि-संघ सर्वदा आश्रय ग्रहण करते हैं।
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