वह 'एकमेव' 'ईश्वर' जो अकेला ही ऐसी अनेक निष्क्रिय सत्ताओं को अपने वश में रखता है जिनका अपना न कोई पृथक् कार्य है न कोई पृथक् उद्देश्य; 'वह' एक ही बीज को बहुविध प्राणियों के रूप में विकसित करता है; सुदृढमना, धीर पुरुष उस 'ईश्वर' का अपनी ही 'आत्मा' में साक्षात्कार करते हैं अतः उनको शाश्वत सुख, आनन्द प्राप्त होता है, अन्य को नहीं।
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