मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
श्वेताश्वतर • अध्याय 6 • श्लोक 17
स तन्मयो ह्यमृत ईशसंस्थो ज्ञः सर्वगो भुवनस्यास्य गोप्ता। य ईशे अस्य जगतो नित्यमेव नान्यो हेतुर्विद्यत ईशनाय॥
'वह' अमृतस्वरूप है क्योंकि 'वह' विशुद्ध सत् है; किन्तु 'वह' ईश्वर में निवास करता है तथा 'परम ज्ञाता' है वह 'सर्वत्र विद्यमान' है जो 'अपने' इस विश्व की रक्षा करने वाला है। वह इस गतिमय जगत् पर नित्य-निरन्तर शासन करता है, और इस ईशस्वरूप शासकत्व का अन्य कोई स्रोत नहीं है।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
श्वेताश्वतर के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

श्वेताश्वतर के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें