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श्वेताश्वतर • अध्याय 6 • श्लोक 16
स विश्वकृद्विश्वविदात्मयोनिर्ज्ञः कालकारो गुणी सर्वविद्‌ यः। प्रधानक्षेत्रज्ञपतिर्गुणेशः ससारमोक्षस्थितिबन्धहेतुः॥
'वह' ही सर्वस्रष्टा तथा 'वह' ही सर्वश है; क्योंकि 'वह' ही योनि (गर्भ) है जिससे 'आत्मा' प्रकट होती है; प्रकृति के 'गुणों' से सम्पन्न 'वह' 'काल' को रचने वाला बन जाता है तथा सर्वविद् 'वह' प्रत्येक वस्तु को जानता है। भौतिक जगत् 'उसका' विषय-क्षेत्र है एवं 'जीवात्मा' है उस क्षेत्र को जानने वाला 'क्षेत्रज्ञ' तथा 'प्रकृति' के गुण उसके दास हैं अर्थात् गुणों का वह ईश-स्वामी है। अतः इस संसार में सम्भूति तथा इस जगत् से मोक्ष का 'वही' हेतु है- और 'उसी' के कारण उनकी स्थिति है तथा 'उसी' के कारण उनका बन्धन है।
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