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श्वेताश्वतर • अध्याय 6 • श्लोक 5
आदिः स संयोगनिमित्तहेतुः परस्त्रिकालादकलोऽपि दृष्टः। तं विश्वरूपं भवभूतमीड्यं देवं स्वचित्तस्थमुपास्य पूर्वम्‌॥
अहो, हमने 'उस' (ईश्वर) का दर्शन किया है और 'वह' समस्त जगत का 'आदि' है तथा समस्त 'कारणों' निमित्तों का 'परमहेतु' है, जिससे सकल पदार्थों का संयोग (परस्पर मिलन) होता है तथा वे रूप ग्रहणं करते हैं; भूत, वर्तमान एवं भविष्य-त्रिकाल, 'जिसके' ऐहिक आयाम हैं तथा 'जो' 'अकाल' है अर्थात् 'काल' का उसमें कोई स्थान नहीं है। हम अपने चित्त में स्थित उस 'पूर्वपुरुष' की उपासना करें। हम उस 'विश्वरूप' धारण करने वाले एवं सम्पूर्ण जगत् (भव) में 'सम्भूति' बनकर प्रकट होने वाले वन्दनीय 'देव' की आराधना करे।
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