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श्वेताश्वतर • अध्याय 6 • श्लोक 10
यस्तुर्णनाभ इव तन्तुभिः प्रधानजैः स्वभावतः। देव एकः स्वमावृणोति स नो दधात्द्ब्रह्माप्ययम्‌॥
जिस प्रकार मकड़ी अपने ही अन्दर से अपना जाल निकालकर चुनती है, उसी प्रकार 'एकमेव देव' (ईश्वर) है तथा उसके अतिरिक्त अन्य कोई सत्ता नहीं है, किन्तु 'उसने' 'स्वयं' को अपने ही द्वारा प्रधान तत्त्व अर्थात् प्रकृति तत्त्व के तन्तुओं से चुने हुए जाल से ढक दिया है। वह 'एकमेव देव' हमारे लिए अपने शाश्वत स्वरूप, 'ब्रह्म' में लय का विधान करे।
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