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श्वेताश्वतर • अध्याय 6 • श्लोक 2
येनावृतं नित्यमिदं हि सर्वं ज्ञः कालकारो गुणी सर्वविद्यः। तेनेशितं कर्म विवर्तते ह पृथिव्यप्तेजोंइलखानि चिन्त्यम्‌॥
'वह' इस सम्पूर्ण 'विश्व' को 'अपने आप' से सदैव ही आवृत किये रहता है, 'वह' ही सर्वज्ञ है 'वह' ही 'काल' का 'कर्ता' (रचयिता) है, 'प्रकृति' के गुणों का 'वही' आधान है, 'वह' सभी पदार्थों का ज्ञाता है, उसके ही शासन से 'कर्म-विधान' के चक्र का विवर्तन होता है, तुम सोचोगे कि पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु तथा आकाश-ये ही वे तत्त्व हैं जिनमें यह विधान-चक्र घूमता है।
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