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अध्याय 3 — तृतीय अध्याय

शिवभारतम्
58 श्लोक • केवल अनुवाद
कविंद्र कहते हैं- बाद में अपने चाचा विठ्ठलजी के भी परलोक चले जाने पर, अपनी माता की आज्ञा का पालन करने वाले,
राजनीतिज्ञ, पराक्रमी, धैर्यवान और बुद्धिमान उस शाहजी राजा ने राज्य का भारी बोझ अपनी हाथों में ले लिया।
विठ्ठलजी राजा के पुत्र संभाजी, खेलजी, मल्लजी, मंबाजी, नागोजी, पशुकजी, त्र्यम्बकजी और वक्कजी ये सभी सहोदर भाई इंद्र के समान शक्तिशाली थे और
राजा मालवर्मा के शाहजी और शरीफजी दो प्रभावशाली पुत्र थे।
पृथ्वी पर विजय पाने के लिए आतुर, युद्ध कार्य में सक्षम, निजामशाह से प्रेम करने वाले, सदैव हाथ में धनुष धारण करने वाले,
पर्वत की तरह उन्नत शरीर वाले, सूर्य की तरह तेजस्वी, अपने अतिशय भुजा बल तथा विशाल परिवार,
सेना और अन्य गुणों से अद्वितीय पराक्रम को प्राप्त ये सभी भाई मलिकंबर द्वारा संशोधित (गणिमा कावा) युद्ध तंत्र का उपयोग करते थे और किसी शत्रु को समरांगन में टिकने नहीं देते थे।
एक बार रनिवास से अपने विश्वस्त विद्वानों मंत्रियों और सेवकों के साथ निजामशाह सभागृह में आकर सिंहासन पर बैठे हुए थे।
तब यादवराज जैसे सभी सरदार उनसे मिलजुलकर और मुजरा देकर शीघ्रता से अपने घर जाने लगे।
एक दूसरे से प्रतिस्पर्धा करने वाले वे सभी राजा जैसे ही जाने लगें, तो सभागृह के द्वार के बाहर अचानक अत्यंत भीड़ हो गई।
वहां मौजूद भाला धारियों ने लोगों को एक तरफ हटाना शुरू कर दिया और वे अतुलनीय शक्ति वाले राजा, कुछ घोड़े पर, कुछ हाथियों पर, कुछ पालकियों पर बैठकर जानें लगें।
उन राजाओं के कंधे ऊंचे और मजबूत थे। उनकी छाती चौड़ी थी और वे (हमेशा) अच्छी तरह तैयार थे।
उन सुन्दर राजाओं की आंखें कमल के समान दीर्घ, मुकुट, कुंडल, मोतियों के बड़े हार और केयूर धारण किए हुए,
और शरीर पर कवच पहना हुआ था तथा वे अपनी-अपनी सेनाओं से घिरे हुए थे और उनके आगे झण्डा फहर रहा था।
उस समय खण्डार्गल नामक राजा का अग्रणी बलवान हाथी अन्य राजाओं की सेनाओं को रौंदता हुआ वेगपूर्वक निकल गया।
महावत के द्वारा अंकुश चुभोकर पग-पग पर नियंत्रित करने पर भी उस मदमस्त हाथी ने अनेक सैनिकों को मार दिया।
सेना को कुचलने वाले, निडरता से गरजने वाले और प्रलयकाल के बादल की तरह प्रतीत होने वाले उस हाथी को कोई नहीं रोक पाया।
जब किसी एक हाथी के दहाड़ने पर जैसे दूसरे झुण्ड के हाथी उसे सहन नहीं कर पाते; उसी तरह इस हाथी की दहाड़ यादवराजा के पुत्र दत्तवर्मा आदि को सहन नहीं हुई।
बाद में, दत्तवर्मा के आदेश पर, वीर योद्धाओं ने मदमस्त हाथी पर तीर, तलवार, भाले, तोमर और शक्तियों से हमला शुरू कर दिया।
हालांकि सैनिकों के द्वारा उस मदमस्त और भीषण कार्यों को करने वाले हाथी को बेध देने पर भी
उसने अनेक घुड़सवारों को अपनी सूंड से खींचकर नीचे गिरा दिया और बहुतों को उसने पैरों से गिराकर अपने तलवों से रौंद दिया।
अपनी सेना को इस प्रकार पराजित देखकर दत्तावर्मा, सिंह की तरह हाथी की ओर दृष्टिपात करके चल दिया।
तत्पश्चात, उसके द्वारा जोर से शस्त्र प्रहार करके घायल किया हुआ वह हाथी अपना सिर हिलाता हुआ रण प्रमुखों के सामने आवाज करने लगा।
तब विट्ठलवर्मा के दो पुत्र संभाजी और खेलोजी खण्डार्गल राजा की सहायता के लिए दौड़कर आए।
वे दत्तवर्मा के चंगुल में फंसे हुए खून से लथपथ और गेरू के पहाड़ जैसे दिखने वाले हाथी की रक्षा करने लगे।
तब दत्तावर्मा ने टूटी हुई सूंड वाले उस मदमस्त हाथी को छोड़कर छोटे भाई, जो शक्तिशाली संभाजी थे, उन पर हमला कर दिया।
क्रोधित हुए उन दोनों योद्धाओं के बीच चल रहे द्वंद्व युद्ध के दौरान, कई योद्धा दौड़ते हुए आए और अचानक एक बड़ी भीड़ इकट्ठा हो गई।
तभी दोनों सेनाओं के बीच हाथों-पैरों से भयंकर युद्ध प्रारंभ हो गया। जहां इंद्र की तरह शक्तिशाली संभाजी ने दत्तवर्मा पर दौड़कर आक्रमण किया,
वहीं संभाजी के भाई शाहजी राजा ने यादव के रिश्ते की खुलकर अनदेखी करते हुए संभाजी का पक्ष संभाल लिया।
तब हाथ में ढाल लिए हुए पराक्रमी दत्तवर्मा ने अपनी तलवार को घुमाकर मानो अपने चारों ओर एक तेजोमय मण्डल बना दिया हो।
उस अचानक हुई लड़ाई में वीरों की गर्जना ने और भुजाओं पर ताल ठोकने की आवाज ने दिशाओं को बहरा कर दिया।
तब वीर दत्तवर्मा अपने तेजोमय मण्डलों से मण्डलों का विस्तार करता हुआ वह विशाल युद्ध के मैदान पर नृत्य करने लगा।
महान वीरों के मुकुट युक्त सिर जमीन पर लुढ़कने लगे, तलवार से धनुष सहित भुजाएं टूटने लगी।
तलवार, तीर, परशु, भाले से कवच छिन्न-भिन्न होने लगे, तीव्र चक्रों से बाण सहित हाथ टूटने लगे।
पोड़ों और मदमस्त हाथियों के शरीर में बाणों के प्रविष्ट होने से बहने वाली खून की धाराओं से धूल अच्छी तरह शांत हो गई।
समरांगन झंडों के निशान से आच्छादित हो गया; बाणों से मनुष्यों के शरीर छिन्न होकर नीचे गिरने लगे और
ऐसे समय में उस वीर शत्रु संहारक यादव (दत्तवर्मा) की संभाजी के साथ मुलाकात हुई और वे मर गये।
अद्वितीय कार्य करने वाला अपना पुत्र दत्तवर्मा संभाजी द्वारा युद्ध में मारा गया है, जब यह खबर आगे गए हुए यादवराज को पता लगीं
तो उसकी आंखें क्रोध से लाल हो गई और वह संभाजी को मारने के लिए आधे रास्ते से ही वापस लौट गया।
उस यादवराज को क्रोधित देखकर धरती, पहाड़, जंगल, द्वीप आदि भी कांपने लगे।
मैं उस दुष्ट को मारकर ही अपनी इच्छा (बदला) पूरी करूंगा, जिसने मेरे प्राण से प्रिय पुत्र को मार डाला है।
इस प्रकार क्रोधित और देवता के समान पराक्रमी, अपने ससुर यादवराज के साथ शाहजी अपने पक्ष की रक्षा हेतु युद्ध करने लगा।
मेरे दामाद युद्ध कर रहे है, ऐसा देखकर शत्रु का नाश करने वाले साहसिक यादवराज ने वासुकी की तरह शाहजी के भुजा पर जोर से प्रहार किया।
उस तलवार के प्रहार से शाहजी बेहोश हो गए और उन्होंने बहादुरी से किसी तरह अपनी जान बचाई।
उस समय खेलोजी को, अन्य राजाओं को, निजामशाह की शिद्दी सेना को पराजित करके
क्रोधित हुए गाढमुष्टि यादवराज ने तलवार निकालकर समरांगन में अपराजेय उस संभाजी पर वेगपूर्वक प्रहार किया।
तब प्रसन्नवदन संभाजी ने मानो शत्रु का उपहास करते हुए अपने तलवार पर वेगपूर्वक हाथ रख दिया।
जिस तरह दो मदमस्त हाथियों में परस्पर भयंकर युद्ध होता है उसी तरह परस्पर प्रतिस्पर्धा करने वाले उन दोनों में लोगों के दिलों को चौंकाने वाली लड़ाई हुई।
उस शत्रु के विजेता यादवराज ने संभाजी की तलवार के कई वार सहे और फिर उन्हें अपनी तलवार से जमीन पर पटक दिया।
यादवराज ने अपने पुत्र की हत्या करने वाले संभाजी को जमीन पर पटककर अपना बदला ले लिया।
जब यादवराज ने युद्ध में विट्ठल राजा के ज्येष्ठ पुत्र का वध किया तो
निजामशाह की पूरी सेना किसी बात का विरोध नहीं कर सकी, क्योंकि उनका साहस समाप्त हो गया था।
जब स्वामी निजामशाह ने दोनों क्रोधित सेनाओं को सांत्वना देकर हटाया, तो वे परस्पर के झगड़े से मुक्त हो गये और
युद्ध के मैदान से संभाजी और दत्तवर्मा की लाशों को लेकर खिन्न होते हुए अपने अपने शिविर में चले गए।
खेलकर्ण प्रभृति संभाजी के छोटे भाई दुःखी होकर अपने बड़े भाई के लिए विलाप करने लगे।
यादवराज ने अपने बेटे की और खेलकर्ण ने भी अपने बड़े भाई की विधिवत् उत्तरविधि की।
घनिष्ठ संबंध के विपरीत, प्रतिस्पर्धा करने वाले भोंसले के साथ जो युद्ध हुआ,
उसका अपने गर्वित हृदय में कुछ विचार किया तो उस समय उन्हें (यादवराज) पश्चाताप हुआ था, ऐसा हमें लगता है।
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