ततस्तंभः प्रसन्नात्मा परं परिहसन्निव।
अरं व्यापारयामास कर कौक्षेयके निजे ।।
तब प्रसन्नवदन संभाजी ने मानो शत्रु का उपहास करते हुए अपने तलवार पर वेगपूर्वक हाथ रख दिया।
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