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अध्याय 8 — मायासिद्धि

प्रबोधसुधाकर
15 श्लोक • केवल अनुवाद
चिन्मात्र परमात्मा ने ही प्रथम अपने आपको आपरूप से देखा। तब उसका नाम 'अहंकार' हुआ। उसी से भेद की नींव पड़ी।
बृहदारण्यक शाखा मे याज्ञवल्क्य की उक्ति द्वारा उपनिषद् ऐसा कहती है कि इस प्रकार वह दो-सा प्रतीत होने लगता है, और उससे पति और पत्नी का आविर्भाव हो जाता है।
तब यह आकाश (आकाश के समान शून्यप्राय पुरुष) सर्वदा स्त्री के द्वारा ही पूर्ण होता है। उस स्त्री ने ईक्षण किया और तब उससे मनुष्यों की उत्पत्ति हुई।
चिरकालीन आनन्द का अनुभव करते-करते परमात्मा की सुषुप्ति के समान कोई अवस्था हो गयी थी। उसी से स्वप्न के समान माया का आविर्भाव हुआ।
यह माया सत् और असत् से विलक्षण है, अनादि है और सदैव परमात्मा के आश्रय रहने वाली है। यह त्रिगुणात्मिका माया ही चराचर जगत्‌ को उत्पन्न करती है।
यदि कहें कि माया तो अव्यक्त है वह इस व्यक्त प्रपञ्च को कैसे उत्पन्न कर सकती है? तो यह बताओ कि अदृश्यरूप सूक्ष्म तन्तुओं से दृश्य (स्थूल) पट कैसे उत्पन्न हो जाता है?
स्वप्न में स्त्री-सम्भोग का अनुभव होने से जिस प्रकार शुद्ध वस्त्र में ही वीर्यपात हो जाता है (उसी प्रकार अव्यक्त प्रकृति से व्यक्त जगत् हो जाता है) जग जाने पर स्वप्न का रमण तो मिथ्या हो जाता है, किन्तु उससे वस्त्र सचमुच बिगड़ जाता है।
स्वप्नावस्था में भी पुरुष तो सत्य ही होता है किन्तु स्त्री असत्य और उन दोनों का संयोग भी मिथ्या ही होता है, फिर भी वीर्यपात सत्य ही हो जाता है। इसी प्रकार प्रस्तुत विषय (अदृश्य माया से दृश्य प्रपञ्च के उत्पन्न होने) में भी हो सकता है।
इसी प्रकार माया तो अदृश्य है किन्तु उसका कार्य यह जगत् दृश्यरूप है, और माया तो यही है कि वह अपने नाश से ही आनन्द देने वाली होती है।
यह अन्धकारमयी रात्रि के समान दुरन्त है, इसके स्वभाव का कुछ पता ही नहीं चलता; क्योंकि मुनिजनों द्वारा विचारपूर्वक देखी जाते ही यह बिजली के समान तुरन्त नष्ट हो जाती है।
यह ब्रह्म के अधीन होने से 'माया' और जीव के आश्रित होने से 'अविद्या' कही जाती है। यह जड़ और चेतन की ग्रन्थि ही 'चित्त' है। इसे जब तक मोक्ष न हो, अक्षय ही जानना चाहिये।
घट, मठ और भित्ति आदि उपाधियों से आवृत आकाश भो घटाकाश, मठाकाश आदि तदनुकूल नाम वाला हो जाता है, उसी प्रकार अविद्या से आवृत शुद्ध, चेतन ही जीव कहलाता है।
शंका-अज्ञान विशुद्ध ब्रह्म का आवरण किस प्रकार कर सकता है? रात्रि का अन्धकार भी क्या स्वयंप्रकाश सूर्य को ढक सकता है?
समाधान - जिस प्रकार सूर्य अपनी ही किरणों से उत्पन्न हुए मेघों से ढक जाता है किन्तु उस मेघ-समूह से दिन के दिनत्व में कोई विकार नहीं होता,
उसी प्रकार शुद्ध आत्मा भी चिरकाल तक अज्ञान से आवृत तो रहता है, परन्तु प्राणियों में जो लोक-प्रसिद्ध चेतनाशक्ति है उसका आच्छादन नहीं होता।
Krishjan
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