द्वेधैव भाति तस्मात्पतिश्च पत्नी च तौ भवेतां वै ।
तस्मादयमाकाशस्त्रिधैव परिपूर्यते सततम् ॥
बृहदारण्यक शाखा मे याज्ञवल्क्य की उक्ति द्वारा उपनिषद् ऐसा कहती है कि इस प्रकार वह दो-सा प्रतीत होने लगता है, और उससे पति और पत्नी का आविर्भाव हो जाता है।
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