मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
प्रबोधसुधाकर • अध्याय 8 • श्लोक 2
द्वेधैव भाति तस्मात्पतिश्च पत्नी च तौ भवेतां वै । तस्मादयमाकाशस्त्रिधैव परिपूर्यते सततम् ॥
बृहदारण्यक शाखा मे याज्ञवल्क्य की उक्ति द्वारा उपनिषद् ऐसा कहती है कि इस प्रकार वह दो-सा प्रतीत होने लगता है, और उससे पति और पत्नी का आविर्भाव हो जाता है।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
प्रबोधसुधाकर के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

प्रबोधसुधाकर के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें